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Wednesday, February 18, 2015

उस पार...

चलना इन सीढ़ियों के पार कभी
हवा के सुकून में बहना कभी


उस पार,
किले की दीवार का एक परदा होगा
ज़माने भर की बेताब निग़ाहों से छुपाता होगा
उस पार,
एक पूरा दिन अपना होगा
एक पूरे साल का बसंत होगा


चलना इन सीढ़ियों के पार कभी...
इस तरफ़ सारी रस्में होंगी
उस ओर सिर्फ़ राहतें होंगी
इस तरफ़ सारी शिकायतें होंगी
उस ओर सिर्फ़ मोहब्बतें होंगी


इस तरफ़ बाहर-भीतर का शोर होगा
उस ओर सिर्फ़ हम दोनों की साँसें होंगी
चलना इन सीढ़ियों के पार कभी...
उस ओर मेरी उड़ती ज़ुल्फ़ें होंगी..
और मुझे निहारते तुम होगे..
उस ओर सिर्फ़ हम होगे..
सिर्फ़ हम होंगे..




फोटो क्रेडिट मुझ ही को जाता है।  तस्वीर दिल्ली से सटे आदिलाबाद क़िले की है।










 

Wednesday, December 10, 2014

ख़त में लिपटी रात... (३)

चोर हो तुम । हाँ, कोई संबोधन नहीं देना है मुझे तुम्हें.. हर बार कोई ख़त ना लिखने का फ़ैसला करती हूँ, लेकिन हर बार कुछ लिखने का मन कर जाता है । तुम्हें भी हर बार मुझे नाराज़ करने की आदत पड़ी है । जानबूझकर नाराज़ करते हो ना मुझे? बस, नाराज़ करके छोड़ देते हो.. एक दफ़ा याद भी नहीं करते । तुम्हीं ने एक बार कहा था ना कि मुझे नाराज़ होने का बहाना चाहिए.. यही समझ लो, पर इस बहाने के बहाने प्यार से गले लगाने भी नहीं आओगे, ये कहाँ पता था ! प्यार करते भी हो मुझसे और नहीं भी । पास चाहते भी हो और नहीं भी । इसलिए कहती हूँ चोर हो तुम । प्यार करते हो तो फिर बताते क्यूँ नहीं ! ऐसा कौन सा तूफ़ान आ जाएगा इज़हार करने से ? चुप छुप के अपनी नज़्मों में मुझे लिखते हो और पूछने पर कहते हो कि मैं किसी के लिए कुछ नहीं लिखता । फिर अब अपनी हर नज़्म में मुझे क्यूँ सजाते हो ? तुमसे अब बात नहीं करती फिर भी याद नहीं करते मुझे । तुम्हारे कुछ बोलने से मुझे कितनी ख़ुशी होगी, ये बेहतर जानते हो तुम । फिर भी । मेरी लंबी बातों का अब भी दो शब्दों में जवाब देते हो तुम । ज़्यादा बोलने से ज़बान जलती है क्या तुम्हारी ! चोरों की तरह चुरा लिया । और चोरों की तरह प्यार करते हो । साथ रहते भी हो पर पास नहीं रहते । अब कहोगे, प्यार नहीं करता । अगर प्यार नहीं करते तो इतना याद क्यूँ आते हो ? मांगने पर भी कुछ नहीं दिया तुमने मुझे । पूछा तक नहीं । तुम मुझे कुछ दे ही नहीं सकते । सिवाय इस अजीब से एहसासात के । तुम मुझे कुछ नहीं दे सकते... प्यार भी नहीं ।

Tuesday, December 2, 2014

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी...

पहली बार ऐसा हुआ है
कि  पहले  'उन्वान'* लिखा है
फिर नज़्म को सजाना चाहा है
वो शायद इसलिए कि
तुम्हारे-मेरे साथ का आख़िरी
मकाम यही होना है
एहसास ये  है
कि तुम्हें आगे बढ़ जाना है
और मुझे तुम्हें खो देना है
अब किसी और बात का
न इसरार^ होगा ना कोई तवक़्क़ो होगी
अब तुम्हारे दर पर ये मेरे कुछ 
आख़िरी ख़तों की दस्तक होगी ।

मेरी रूह ने तुममें
कोई अपना महसूस किया था
उस पागल ने तुम्हें
बेइंतहा अपनापन दिया था
तुम्हारे नाम को भी
अपने नाम के साथ सजाया था

तुम भी इक दफ़े
आये थे बहार की तरह खिलते हुए
मुझ डाली को
अपनी बाहों में समेटने के लिए
उस शाम जब
तुमसे शर्माने का नज़ारा होता था
तभी मेरा
ख़ुद से ख़ुद ही में सिमटना होता था
वो तुम्हारे साथ
मेरी रूह का आख़िरी सुक़ून था ।

न जाने हवाओं से कहकर
तुम्हें कितने पैग़ाम पहुँचाये फ़िर
सारे मौसमों को
तुम्हारे घर का पता भी बताया था
न जाने क्या क्या
उन ख़तों में लिखकर भेजा है मैंने तुम्हें
कोई हर्फ़ ना लिखकर भी
बहुत कुछ कहा है तुम्हें
मैं कहते कहते थक गयी
तुम चुप ही रहे
मैंने तुमसे चुप रहने की आदत जब सीख ली
तुम फिर भी ख़ामोश ही रहे ।

अब तुम्हारी नज़्मों में
जो ख़्याल उड़ता है उनमें
अपनी शक्ल ढूंढती हूँ मैं
तुम्हें पास लाने का ख़्वाब
फिर सताने लगता है
तुम्हें भूलने का इरादा
ज़रा सा डगमगाने लगता है
पर तुम बेफ़िक्र रहना
मेरे ख़त तुम्हें अब परेशान नहीं करेंगे
आख़िरी तोहफ़ा
बग़ैर किसी ख़त के भेजा है तुम्हें ।
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*शीर्षक
^ज़ोर देना या ज़िद करना

Friday, November 7, 2014

पुरानी दिल्ली का ख़ास अंदाज़

दिल्ली में ऑटो वाले और रिक्शे वाले अच्छे मिल जाए तो लगता है पिछले जन्म के अच्छे करम का कोई फल मिला है । पहले पुरानी दिल्ली की भूल भुलैया में गुम हुई, परेशान इतना हुई कि अमरुद खरीद के खाना भूल गयी और फिर भागमभाग से परेशान । मेट्रो स्टेशन के लिये रिक्शा लेना ही उचित समझा । रिक्शे वाले अंकल से हुई बातचीत ---

- कैसी सड़क है !!! पता नहीं भगवान ने कैसी सड़क बनायी है ।
- हाहा, भगवान ने बनायी है ये सड़क ?
- और नहीं तो क्या ! आदमी को पढ़ा लिखा होना चाहिए.. चाहे कोई भी काम करता हो, लेकिन पढ़ा होना चाहिए । जैसे मैं रिक्सा चलाता हूँ और भी कई सारे काम करता हूँ ।  जैसे ये विदेसी लोग आते हैं, कुछ बोलेंगे और हम इनका मुंह ही देखते रह जायेंगे । पहले तो इंगलिस मुझे आती नहीं थी । फिर धीरे धीरे सीखा । ये होती है ना, डिशनरी.. वो खरीद के लाया मैं ।
- तो अब आप विदेसी लोगों से बात कर लेते हो ?
- हाँ, और नहीं तो क्या? वो बोलते है, हे विल यू गो । यस यस कमऑन ।

(मैं अंकल की बात सुनने की कोशिश कर रही थी, समझ रही थी और हँस भी रही थी । सामने से बाइक पर बैठे दो लड़के आ रहे थे, बड़बड़ाते हुए आगे निकले, अरे ये तो हँस रही है । (भगवान्, इस देश में सबको सद्बुद्धि दे) ख़ैर..)

- पहले तो मुझे स्पाइस का मतलब भी नहीं पता था, एक लेडीस आई और बोली कि स्पाइस मार्केट ले चलो । मैं कहूं, ये क्या होता है ? फिर समझ आया ।
मेहनत करना चाहिए.. मेहनत करने से जो है सरीर का कंफिडेंस बना रहता है । अच्छा अच्छा खाओ..खूब खाओ और कुछ नहीं । मैं तो कुछ गलत नहीं खाता.. सिर्फ़ चाय और खाना । ओनली टी एंड फूड । अरे बहुत जाम है.. यही तो फेमस है.. दिल्ली का जाम और लखनऊ का आम ।

(दरयागंज का ट्रैफिक खचाखच था । मेरे लिए जाम जाए चूल्ही में । मैं अंकल की बातों पर कॉसन्ट्रेट कर रही थी ।)

- अच्छा ये जो बिहारी लोग होते है, ये कम पढ़े-लिखे होते है । इनका प्रतिसत बहुत कम होता है ।
- तो आप बिहार से हैं क्या ?
- नहीं, मैं यूपी का हूँ.. लखनऊ का ।
ये लो, आ गया । मिट्रो । खूब चैन से रहो और भगवान को फोन मिलाते रहो ।
- हेहे.. भगवान के पास फ़ोन है ?
- हाँ, और नहीं तो क्या! देखो, तुम्हें जो भी बात हो ना, भगवान को बोल दो । कहते हैं ना, उससे शेयर करो । ऐसा बोलते है, भगवान जो है, भक्त के बस में रहते है । फौन मिलाते रहो ।

Wednesday, November 5, 2014

बिखरी नज़्म...

तुम्हारा आना भी एक ख़्याल था
तुम्हारा जाना भी एक सपने जैसा है

तुम मुझसे मिले थे.. मेरे साथ रहे भी थे
अनजान होगे तुम इस बात से
पर ख़ुशबू तुम्हारी अब तलक मेरे
आसपास टिकी है

याद है तुम्हें...?
तुमने मुझे गले से भी लगाया था
ख़्वाबों के लचकते पुल पर चार कदम
साथ भी चले थे तुम
याद है तुम्हें...?
इक रोज़ तुमने मेरे गालों पर बोसे का गुलाल
लगाया था
बिखरी जुल्फों को कानों के पीछे फंसाकर
चेहरे को अपने दोनों हाथों से थामकर
चुपचाप मेरी नज़रों से कुछ कहा था

ये सब मेरा इक ख्व़ाब था क्यूंकि
तुम्हारा आना भी एक ख़्याल था
और जाना भी एक सपने जैसा है

अब बारिश..हवाएं..धूप.. ये सब आती हैं
तुम्हारा पैग़ाम लेकर
जैसे तेज़ हवा के चलने से मेरे झुमके
पायलों सा शोर करते हैं
हल्की धूप जब आँगन में खिलती है..
बिखरती है ।

ये सब हैं.. तुम कहीं नहीं
मैं वहीँ, उस समन्दर किनारे वाली बेंच पर
बैठे बैठे न जाने क्या बुदबुदा रही हूँ
तुम कहीं नहीं हो, लेकिन शायद सुन रहे हो
तुम्हारे पाँव के निशान भी दिखते नहीं...
...तुम गए नहीं हो क्या अभी तक...?

Sunday, August 10, 2014

रक्षाबंधन

जीवन में बड़े भाई का होना बहुत ज़रूरी होता है । ठीक वैसे ही जैसे छोटा भाई, बहन की हर गलती में, हर शैतानी में उसका साथ देता है.. वैसे ही बड़े भाई लाइफ की हर छोटी-बड़ी प्रॉब्लम को समझने का, उन्हें सुलझाने का नज़रिया देते हैं । मुझे तो शुरुआत में भैया के साथ रहने का ज़्यादा मौका नहीं मिला.. पर पिछले कुछ सालों से, जब से दिल्ली में हूँ.. हम दोनों को एक-दूसरे के साथ ज़िन्दगी समझने का मौका मिला । हालांकि इस दौरान पिछ्ले कई साल साथ नहीं बिताने और हम दोनों के बीच छ: साल के अंतर की वजह से मुश्किलें आती रही । समझदारी का अनुपात बहुत गड़बड़ा देने वाला हो जाता है ना ! :)  ख़ैर, अब वो अंतर काफी हद तक मिट चुका है और मैं भी औसतन काफी समझदार हो गयी हूँ ।
इसके अलावा, भैया की वजह से भाभी आयीं और मुझे ननद बनने का सौभाग्य मिला। साथ ही भाभी पर रौब झाड़ने का भी  ;)

इन्हीं बातों के साथ, इस बार भी भैया को रक्षाबंधन की बहुत बहुत शुभकामनाएं और साथ में, यह ब्लॉगपोस्ट जो पिछले साल लिखी थी । - http://aanchalkiaashayein.blogspot.in/2013/08/blog-post_20.html

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इन सबके बीच इस राखी, घर पर रह रहे अपने छोटे भाई की भी बहुत याद आई । जब पिछले साल घर गयी थी, तब गोलू बहुत बड़ा और बहुत समझदार लग रहा था । एक बार को यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि ये छोटी माँ का वही छोटा सा बेटा है जिसने मेरे सामने जन्म लिया था । वही छोटे-छोटे हाथ.. छोटे-छोटे पैर वाला - कन्धा नापते नापते अब मुझ से भी लंबा हो गया है । अब पढ़ाई, करियर, राजनीति, इत्यादि इत्यादि को लेकर उसके ढ़ेरों सवाल होते हैं ।

ये छोटे भाई इतने बड़े और केयरिंग कैसे हो जाते हैं !! कपड़ों से निकली ब्रा-स्ट्रैप को देखकर वो नज़रें झुकाकर, धीरे से कहते हैं, 'दीदी, कपड़ा सही कर लीजिये' । या फिर बाज़ार में सबकी नज़रों पर गहरी निगरानी रखते हैं .. साथ चलने पर हमें बायीं ओर और ख़ुद हमारे दायीं होकर चलने लगते हैं.. मार्केट से कुछ लाने की बात पर कहते हैं- आप कहाँ जाईयेगा.. हम ला देते है । या हम भी साथ चलते है । इन छोटे भाइयों का इतना केयरिंग हो जाना बहुत प्यारा लगता है और शायद यही सब हम लड़कियों को अपने मायके को छोड़ते वक़्त रुलाता है ।

 

Monday, August 4, 2014

एक सावन ऐसा भी

हर साल सावन शुरू होते ही दादी की सबसे प्रिय पोती नहीं होने के बावजूद भी मुझे उनकी याद आ जाती है । इधर ये महीना शुरू हुआ नहीं कि दादी का शोर शुरू हो जाता था ।  घर की बहुओं के लिए हरी चूड़ियां/लहठी मंगवाने के लिए तो कभी रोज़ मंदिर जाकर शिव जी पर जल चढाने के लिए । रोज़ मंदिर जाने की चिढ़ से 'भक' बोलकर  बच भी जाते थे, लेकिन ये चूड़ियां लाने का काम तो मैं बड़े शौक से करती थी । दुकान से सामान घर लाकर सबको पसंद करवाना और फिर वापस जाकर पैसे देना- इस क्रम में या इस काम के बदले में दो-चार चूड़ियां मुझे भी पहनने को मिल जाती थी । यही कारण है कि आज भी सावन शुरू होते ही दादी की आवाज़ कानों में गूंजने लगती है, "रे जाही न रे ! माई आ छोटी माई लागी चूड़ी लावहि ना" । अब घर फ़ोन कर के सबसे पहले माँ को याद दिलाती हूँ, "माँ, हरा लहठी पहनी कि नहीं?"
इसके अलावा हर सोमवार को बेलपत्र पर राम-राम लिखवाने का काम भी होता था । नागपंचमी के दिन पूरे घर के पक्के वाले हिस्से को धोना और कच्चे वाले हिस्से को मिट्टी-गोबर से लीपना । हालांकि ये सब काम करवाए जाते थे । लेकिन पूरा सावन ऐसे बीतता जैसे तीसों दिन ही कोई त्योहार हो । नागपंचमी के बाद, सावन के बचे दिनों में से किसी एक दिन कुलदेवता की पूजा होती है और पूजा तक कुछ भी तला हुआ बनाने की मनाही । पूजा के दिन दालपुड़ी, खीर इत्यादि इत्यादि बनते । लकड़ी के चूल्हे पर । माँ-चाचियाँ दिनभर पूजा की तैयारियों में लगी रहतीं और हम बच्चे रंगीन कागज़ को तिकोने शेप में काटकर झंडियां बनाकर, लेई बनाते और फिर रस्सियों पर लगा लगाकर पूरे घर को सजाते, अशोक के पत्ते को भी इसी तरह रस्सियों में सजाते ।
बहरहाल, सावन में अब कुछ ही दिन बचे है.. कुलदेवता की पूजा इसी हफ़्ते घर पर होगी.. नागपंचमी तो बीत ही चुका है । लेकिन दादी फिर अगले सावन ऐसे ही यादों में आ जायेगी। सावन क्या, बल्कि हर त्यौहार के दिन.. आश्विन-कार्तिक हर महीने । अफ़सोस इस बात का है कि दादी जब आसपास थी तब उनके ज़्यादा क़रीब नहीं हो पायी मैं.. (या उन्होंने करीब लाया नहीं) .. अब ऐसे ही हर तीज-त्योहारों पर दादी को अपने आसपास महसूस करती हूँ ।

(दादी से जुड़ी बहुत सारी बातें हैं.. समय-समय पर शेयर करने की कोशिश करुँगी)।