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Tuesday, July 8, 2014

अनजाने लोग

वर्कशॉप में वो मेरे पीछे वाली सीट पर बैठी थी । सुन्दर साड़ी, साड़ी का पल्ला चुन्नटों वाला नहीं था..एक पल्ला था (फ्री फॉल), मैचिंग चूड़ियां और बात करने का तरीका बिलकुल ठेठ । आरती प्रियदर्शिनी ।

इतनी साधारण, फिर भी इतनी आकर्षक । बाकियों का नहीं पता, पर मुझे नामालूम क्यूँ बार-बार इनसे बात करने का मन कर रहा था । पहले दिन तो आगे चुपचाप बैठकर, लंच टाइम में होने वाली इनकी बातचीत को मैं सुन रही थी । वर्कशॉप में सब एक-दूसरे से अजनबी थे, पहली बार मिल रहे थे.. इसलिए वो अपने आसपास बैठी बाकी महिलाओं से बातें करने लगी ।

"हम गोरखपुर से आये हैं।"
"गोरखपुर से दिल्ली सिर्फ इसी वर्कशॉप के लिए?"
"हाँ, और हम पहली बार दिल्ली आये हैं। बहुत मन करता है लिखने-पढ़ने का। गृहस्थी के काम से जब भी टाइम मिलता है, मतलब सब काम कर लिए ना, उसके बाद जो भी समय बचता है..उसमें लिखते है । पत्रिका तो हम खूब पढ़ते हैं..हिंदी पत्रिका । गृहशोभा में कुछ कहानियां भी छप चुकी है ।"
बाकी की महिलाएं गोरखपुर के बारे में पूछने लगी। उन्होंने मान्यता के अनुसार बताया, फिर कहने लगी, "हमारा मायका मुज़फ्फरपुर है । (ये सुनकर बातचीत में मेरा इंटरेस्ट जाग गया,चूँकि मैं पड़ोसी जिला की हूँ..शायद इसलिए) ये नाम भी मेरे दादाजी का ही दिया हुआ है । उनको इंदिरा जी बहुत पसंद थीं, इसलिए वो चाहते थे कि उनकी पोती भी कुछ करे..इसलिए उन्होंने मेरे नाम के आगे प्रियदर्शिनी लगा दिया है । (हँसते हुए आगे कहा) अब उतना कहाँ हो पाता है.. वहाँ तक पहुंचना मुस्किल है। इसलिए कहानी -लेख लिखकर अपना मन का कुछ करते रहते है ।"

उस दिन का सेशन ख़तम होने वाला था..मुझे जल्दी निकलकर एक हिस्टोरिक सेशन के लिए दूसरी जगह जाना था । इसलिए आरती प्रियदर्शिनी से मुलाक़ात अधूरी रह गयी ।

अगले दिन मैं लेट पहुंची.. पर आरती जी वहीं पीछे वाली रो में ही बैठी थी। आगे वाली सीट ख़ाली थी, इसलिए मैं दुबारा से उनकी बात सुनने के लिए वहीँ बैठ गयी । आज भी साड़ी वैसी ही पहनी हुई, गुलाबी रंग की । और चूड़ियां बदली हुई, साड़ी की मैचिंग । लंच-टाइम हुआ तो मैंने पीछे मुड़कर बात शुरू कर ही दी।

"हर साड़ी की मैचिंग चूड़ियां लेकर आई हैं आप?"
एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ उन्होंने कहा, "हाँ, हमको चूड़ी का बहुत शौक़ है । जहां भी जाते है, सब साड़ी का मैचिंग ले जाते हैं ।"
"तब तो चूड़ी का एक अलग बैग होता होगा!"
"हाहा, हाँ । मेरे पति को बहुत पसंद है.. इसलिए परेसानी नहीं होती ।"
शायद वो मेरी बात समझ गयी थी, कि पुरुष ज़्यादा लगेज बनाने पर और ढोने पर झल्ला जाते हैं ।
मैंने आगे कहा, "पहली बार दिल्ली आई हैं.. घूमी दिल्ली?"
"हाँ, कल यहाँ से निकलने के बाद लाल क़िला गए थे । पति- बच्चे इतनी देर के लिए कहीं आसपास चले जाते है। फिर शाम को हमको लेने आ जाते हैं । "
मैं पूछती रही वो बताती रही, उन्होंने ये भी नहीं पूछा कि मैं क्यूँ पूछ रही हूँ !!
"वैसे तो हम हर साल घूमने जाते हैं..हर साल घूमते है हम.. जब अपने तरफ सीतलहर चलता हैं ना तब हम पूरा साउथ इंडिया घूमते है ।"
निश्चित ही मुझे इससे लग गया था कि आरती जी के पति उन्हें बेहद प्रेम करते है.. तभी तो शीतलहर में कड़कड़ाती ठण्ड से बचाने के लिए, दस दिनों के लिए ही सही आराम की छुट्टी दे देते है ।

सेशन के दौरान उन्होंने सवाल भी पूछा तो इतनी आसानी से .. अपनी बोली में.. बिना हिचकिचाहट। अपने बगल में बैठी एक महिला, जिनके हाथ सूने थे.. आरती जी ने ना जाने क्या सोचते हुए एक कंगन अपनी बैग से निकालकर उन्हें दे दिया । कहा, पहनिए, हम आपके लिए ही लाये हैं ।

मुझे आरती प्रियदर्शिनी बहुत अच्छी लग रही थी । पीछे बैठे वो बोली जा रही थी और मैं कुर्सी पर पीठ टिकाकर, सिर को थोड़ा पीछे झुकाकर उनकी बात सुनकर मुस्कुरा रही थी । कई बार मंच पर बोल रहे वक्ता की बात से ज्यादा मुझे आरती जी की बात में रूचि हो रही थी ।  (और मुझे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि इसका नतीजा इस ब्लॉगपोस्ट के रूप में आएगा ।)

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