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Friday, May 9, 2014

रात की बात...

रात ख़ामोश होकर भी
अनगिनत बातें कह जाती है ।

आता है कोई शायर
यूँ ही किसी रात
खानाबदोश सा
रात को ही सिरहाना बनाकर
उसके ही बिस्तर पर
तकिये का टेक लगाकर
रात के बदन पर
अपनी नज़्म पूरी कर जाता है ।
किसी खुदगर्ज़ आशिक़ की तरह
हर बार गुज़रते हुए
रात को अपनी
नज़्मों में सिमटा लेता है ।
कलम की बेबाकी और
डायरी के पन्नों की शोखी में
जिंदा लफ़्ज़ों के साथ
दफना देता है । 

क्यूँ ना तुम भी यूँ ही किसी रात
मेरे सामने बैठ जाते
अपने लिए ना सही
मेरी ख़ुशी के लिए आ जाते ।
बेसब्र रात कटती रहती
कोई नज़्म भी बढ़ती रहती
बच जाते हम-तुम
तो हम भी किसी डायरी में
किसी आवारा शायर की
ख़ूबसूरत नज़्म बनकर
दफ़न हो जाते
शायद थोड़ा-सा और जी पाते ।
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Tuesday, May 6, 2014

मुझे जाने दो...

कितना आसान है न
तुम्हारे लिए ये कहना कि
तुम जियो अपनी ख़ुद की
बनायी दुनिया में,
वो बंजर है
        ...मुझे जाने दो ।

कितना आसान है न
तुम्हारे जमात के लिए
हम जमातों की बेतरतीब
लेकिन नाज़ुक सी
भावनाओं के साथ खेलना
अपना वक़्त संवारना
और कहना कि
          ...मुझे जाने दो ।

तुम्हें क्या पता
वक़्त-बेवक़्त तुम्हारी मौजूदगी
की बारिश के लिए ही तो
मेरे ख़्वाबों की दुनिया बंजर है
और तुम मेरी इस प्यारी सी
दुनिया में रहना ही नहीं चाहते
बस दम भरते रहते हो
            ...मुझे जाने दो ।

चले जाओ,
जाना ही है तो चले जाओ ।
मेरे शब्दों की तरह
मेरी दुनिया भी साधारण है
पर थोड़ी बेतरतीब है
तुम्हें कहाँ रास आएगी
अप-टू-डेट जो नहीं
साधारण है ... अति साधारण ।

अब ठहरने की बात ना ही करो
बाकी बातों की तरह
बाकी कहानियों की तरह
इस साधारण कविता को भी
अधूरी ही रहने देती हूँ
         ... मुझे जाने दो ।

...........

Sunday, May 4, 2014

बकबक - २

कभी-कभी रातें बहुत अच्छी लगती हैं.. और कभी-कभी रातें बहुत बहुत बहुत ज्यादा अच्छी लगती हैं । जब ऐसी लगती है, तब लगता है कि रात ख़तम ही ना हो.. बीते ही ना.. सुबह हो ही ना । बस पलकों पर ख़्वाबों का बोझ उठाये रखो और आसमान तकते रहो.. मेरा मतलब घर की सीलिंग । अच्छा था जब इतने ज्यादा शहर नहीं थे.. कम से कम ख़्वाब तो हम आसमान के साथ देखते थे ।
कभी-कभी सोचती हूँ, सिर्फ़ मैं ही तो नहीं सोचती । मेरे जैसे तो कई सारे लोग है.. छोटी-छोटी बातें हमें बुरी लग जाती हैं और छोटी-छोटी बातें बहुत ख़ुश भी कर जाती है । रवीश सर ने एक बार अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था - "काश हम भी मोटी चमड़ी के होते ।"  अच्छा होता ना, ना किसी की बात दिल पे लगती.. ना दिल की बात किसी को बताते । इमोशनल होना बहुत injurious होता है । इसका ये कतई मतलब नहीं कि हम ख़ुद के बाहर कोई ख़ुशी ढूंढ रहे हैं । ख़ैर....

इन सबके बीच, मैं आज पूरी बेशर्मी के साथ, एक घर का दरवाज़ा खटखटा के (आज ही उनके घर में आई) नयी दुल्हन से मिल आई । हमारी ही बिल्डिंग के फोर्थ फ्लोर पर रहते हैं ..तो नयकी कनिया (दुल्हन) से मिलना ज़रूरी था । और ये मेरे बचपन की आदत है, आस-पड़ोस की किसी नयी दुल्हन को जबतक ना देख लूं, मेरे पेट का भात नहीं पचता । अगर कहूं कि मुझे नयी दुल्हन देखने का बड़ा ज़बरदस्त क्रेज़ है, तो कोई ग़लत बात नहीं होगी । बहुत मज़ा आता है ... और साथ में कुछ गॉसिप मिल जाती है, सो अलग । हालांकि मैं मिठाई लेकर गयी थी, लेकिन लालच शादी के मिठाइयों को खाने की थी  । इसलिए उधर से प्लेट भर के खाजा, गाजा और लड्डू ले आयी ।

मेरे हिसाब की ज़िन्दगी तो यूँ ही चलती है ... छोटी-छोटी खुशियों से.. छोटी-छोटी बातों से । वैसे भी, पता नहीं मेरा और दिल्ली के मौसम का क्या रिश्ता है.. जब भी मैं बहुत ज़्यादा उदास होती हूँ, तब ये भी बदल जाता है । पहले तो इतनी गरमी थी , अब आज मौसम कुछ ठंडा सा है.. बारिश हो जाती तो मेरा मन फिर से अच्छा हो जाता । लगता है आसपास कहीं बारिश हुई है, हाँ कल हल्की बूंदा-बांदी ज़रूर हुई थी  । (बिहार में हमलोग इस  बूंदा-बांदी/drizzling को "झीसी पड़ना" बोलते हैं)

और जब तेज़ ठंडी हवाएं आ ही गयी हैं, वो भी खासकर सिर्फ़ मेरे लिए.. तो बारिश भी आ ही जायेगी ।
और अब बारिश से ज़्यादा सुबह का इंतज़ार है.. सुबह होगी तो कोई ठंडा पेय पीने से थोड़ा ठीक लगेगा । आप भी ट्राई कीजियेगा- सत्तू+निम्बू का रस+चीनी+काला नमक+खीरा कद्दुकस किया हुआ+ग्लूकान-डी+रूह आफज़ा+दही +ठंडा पानी  -- सबको मिक्सी में मिक्स कर दीजिये और पी जाईए ।

(मुझे नहीं पता, मेरी नींद में बड़बड़ाने की आदत कब जायेगी..)
गाने तो आज बहुत सारे सुन लिए, अब ये आज का आख़िरी गाना --
http://www.saavn.com/p/song/hindi/Parineeta/Raat-Hamari-Toh/JVgRRUd9XFE

Friday, April 18, 2014

तुम आओ तो ...

साँसें आजकल  थमी-थमी सी  हैं
तुम आओ तो इनकी रफ़्तार बढ़े ।

इंतज़ार में पलकें बोझिल हुई जाती हैं
तुम आओ तो साथ की कोई बात चले ।

कदमें थकी हैं.. दिल परेशां सा हैं
तुम आओ तो ये मंज़िल की ओर बढ़े ।

हो सके तो आना ऐसे कि
       सारा ज़माना रश्क़ करें मुझसे
तुम आओ तो हम तुम्हारे साथ चले ।

जो दीदार ना हुआ तो बिखर जायेंगे हम
जो  तुम  आओ तो  ये साँस  चले ।

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Monday, March 31, 2014

नीले आसमान के नीचे...

आओ कभी साथ..
यूँ ही नीले आसमान के नीचे,
हरी घास पर
सफ़ेद-पीली चादर बिछाकर
देर तलक गुफ़्तगू करेंगे ।

चाँद आजकल बेईमान हो चला है..
चुपचाप सारी बातें सुनता है..
ख़ुद की तारीफ़ पर बड़ा इतराता है..
दूर रहकर भी, हम जैसों को,
अपनी ठंडक से जलाता है...
बड़ा बेईमान है ये..

चलो ना, यूँ ही इसे जलाते हुए..
हम भी इसकी लौ में बैठे
इसको तकते रहें ।
अपनी मुहब्बत से...
इसे भी जलाते रहें ।

चलो ना, इसी बहाने
सुबह के सूरज का भी इंतज़ार कर ले ।
उसे भी अपने मुहब्बत का दीदार करा दें..
थोड़ा सा उसे भी जला दें ।

......

Sunday, March 30, 2014

लाइब्रेरी की मुलाक़ात !

किताबों की चहारदीवारी के बीच,
कविताओं वाले सेक्शन में..
एक ही किताब पर दोनों ने साथ हाथ रखा था..
फिर हम दोनों की नज़रों ने,
एक दूसरे को छुआ था..
ये थी हमारी पहली मुलाक़ात..
किताबों की चहारदीवारी के बीच,
लाइब्रेरी में ।

कविताएं पढ़ते-पढ़ते..
नजदीकियाँ बढती गयीं..
जैसे कविता की दो पंक्ति
एक साथ जुड़ती रहीं ।

कौमा, फुल स्टॉप, एक्सक्लामेशन सा
हमारा रिश्ता बढ़ता गया..
किताब की चहारदीवारी के बीच
कितना कुछ सिमटता-घटता चला गया ।

ऐसा हो, किसी दिन हम-तुम भी,
किसी कविता की किताब हो जाएँ..
ऐसी ही किसी चहारदीवारी में सुकून से रह पाएँ..
बस, समीक्षा और विश्लेषण से बच जाएँ..
ऐसे दुश्मनों को हम पहचान में भी ना आएँ !

ये थी हमारी पहली मुलाक़ात..
किताबों की चहारदीवारी के बीच,
लाइब्रेरी में ।

.....

Tuesday, March 11, 2014

यूँ ही...

बेवजह चाँद को देखकर दिल की बातें कह जाना..
प्यार जताने का ये भी इक तरीका है ।

गुमसुम खड़े होकर आसमान को तकना..
किसी के इंतज़ार का ये भी इक सलीका है ।

आईने झूठ नहीं बोलते, ज़रा ध्यान से देखो..
तुम्हारी मुस्कराहट का रंग आज ज़रा फ़ीका है ।

तस्वीर के अन्दर से झांकती तुम्हारी आँखें..
बताओ, क़त्ल करने का ये कौन-सा तरीका है ।