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Tuesday, June 28, 2016

वूड बी बहू - पार्ट वन

चाहिए 24/7 सर्विस वाली बहू
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इतवार के रोज़ दोपहर बारह तक लड़के के परिवार को आना था । लेकिन कॉल आया कि किसी ज़रूरी काम के लिए रुके हैं, फ्री होकर ही आएंगे । लेकिन तब भी कोई समय नहीं बताया । शाम 6 बजे कॉल आया कि आधे घंटे में आ रहे हैं। लड़के के माता-पिता, चाचा-चाची और दो बहनें । (इसके पहले ये भी नहीं पता था कि कितने लोग आ रहे हैं) ख़ैर, ख़ातिरदारी शुरू हुई, नाश्ते परोसे गए। अमूमन होता ये है कि औरतें घर के अंदर वाले कमरे में चली आती हैं, तो वैसा ही हुआ। लड़की गयी, पानी का ग्लास रखा और साइड में जाकर खड़ी हुई,

लड़के की माँ: तुम्हें देखने आएं हैं और तुम्ही जा रही हो।
लड़की: देखिये ना, देखिये!
चाची: जॉब करती हो?
- जी
- क्या सोचा है, आगे भी करना है?
- हाँ, बिलकुल
- तो कैसे करोगी सब घर-परिवार ?
- कैसे मतलब क्या! करती हैं लड़कियाँ.. दोनों संभल जाता है आराम से ।
- हॉबीज़ क्या है?
- पढ़ना, गाने सुनना और लिखना।
- अच्छा, लिखती भी हो? (अभी तक जॉब के विषय में कुछ भी नहीं पूछा गया था)
एक बहन: पर हमें तो कोई ऐसा चाहिए, जो घर पर माँ के साथ रह सके.. क्यूंकि सब चले जाएंगे तो कोई तो हो।
लड़की: चुप *मन में - सबसे अच्छा,नौकर रख लो तो*
चाची: नाम क्या है तुम्हारा?
लड़की: *ठहाका लगाकर हँसते हुए* अपना नाम बताया
सब आपस में: पूछो ना, तुम पूछो, क्या पूछे, कुछ पूछ लो
एक बहन: तो आप जॉब करोगे ही (ऐसे जैसे वो अभी के अभी हाँ या ना का फ़रमान सुना कर चल देगी)
लड़की: हाँ। तुम तो देख ही रही हो ना, हमारी जनरेशन कैसे चल रही है.. सब काम कर रहे हैं.. बच्चे भी पैदा कर रहे हैं और घर भी संभाल रहे हैं, तुम्हारी ऐज क्या है?
बहन: 23
लड़की: तो तुम तो समझ रही होगी सब। हाँ, ज़िन्दगी में आगे कैसे क्या होगा, ये तो सिचुएशन पर डिपेंड करता है।
बहन: सब कर रहे हैं, आप अपने बारे में बताइये ना
लड़की: हाँ, मैं जॉब करुँगी ही ।
माता जी: तो कमी किस चीज़ की है!
लड़की: कमी की बात नहीं है, जॉब करने से बहुत समझदारी आती है। रेस्पोंसिबल होते हैं, इंडिपेंडेंट होते हैं।
माता जी: और अगर लड़के ने मना कर दिया तो?
लड़की: तब तो ये ग़लत है। बहुत ग़लत है ।
माता जी: ग़लत कैसे हुआ?
लड़की: कैसे नहीं हुआ! जब कोई बात नहीं हुई है, बात पक्की नहीं है, बात आगे नहीं बढ़ी है और कोई इस तरह की पाबंदी लगा रहा है तो वो आगे चलकर कितनी पाबंदियाँ लगाएगा!
दूसरी बहन: पाबन्दी कहाँ है कोई, बस जॉब करने को ही तो मना कर रहे हैं और भइया को भी चाहिए जो माँ के साथ रहे ।
लड़की की माँ: आराम से जवाब दो
लड़की: ठीक से ही तो बोल रहे हैं माँ या तो फिर चुप ही रहती हूँ।

*शोर शोर शोर शोर शोर शांति*

चाची: खाना बना लेती हो?
- हाँ
- क्या क्या बना लेती हो?
- सब कुछ बना लेती हूँ ।
- हाँ मतलब वही क्या क्या? हम को तो पता नहीं है, तुम ही बताओ
- दाल चावल रोटी सब्ज़ी भर्ता चटनी और पानी उबाल लेती हूँ ।
- पानी तो छोटे बच्चे भी उबाल लेंगे ।
- आजकल वही करना नहीं आता ।
- नहीं, कुछ स्पेशल बनाती हो?
- ऐसे कैसे किस चीज़ का नाम लें! हाँ, कुछ कुछ ट्राई करती रहती हूँ।
- मतलब कोई डिश, डोसा हो गया, इडली हो गया
- देखा है माँ को बनाते हुये, ख़ुद से बनाया नहीं कभी.. ज़रुरत पड़ी तो बना लेंगे
- नहीं, सीखना चाहिए सब कुछ..आजकल लड़की को सबकुछ आना चाहिए ।
- लड़की *मन में - तो फिर सबकुछ में जॉब करना भी तो आना चाहिए। और ज़रूरी तो दाल-चावल ही बनाना है, डोसा बनाना आ भी गया तो क्या रोज़ वही खाएंगे!*

मन में इसलिए कि कई बार लड़कियों पर प्रेशर होता है, पहले चरण में ही माँ-बाप की इज़्ज़त बनाने का। मन मार कर चुप रहना पड़ता है.. सोचिये, लावा कितना उबलता होगा लड़कियों के अंदर।

एक बहन: क्या पसंद है आपको?
लड़की: अभी बताया था, लिखना, पढ़ना आदि आदि
बहन: घूमना पसन्द है?
लड़की: हाँ, बहुत पसंद है.. बहुत घूमती भी हूँ।
दूसरी बहन: जीन्स टॉप पहनते हो?
लड़की: *मन में* (ऐसे सवाल तो गाँव में भी नहीं करते होंगे।)
जवाब देते हुए, हाँ ।
चाची: और साड़ी पहनती हो?
लड़की: हाँ, ख़ूब पहनती हूँ।
चाची: ऐसा तो नहीं कि साड़ी पहन कर काम नहीं होगा ।
लड़की: अब ये तो पता नहीं, पर पहनती हूँ।

इस बीच जब चाय-पकौड़े लाये जा रहे थे, तब लड़की ने उनकी टेढ़ी मुस्कान और मज़ाक उड़ाते हुए फुसफुसाते शब्द सुने
~चटनी बना ही लेती है.. घुमती है ही.. पानी उबालने आता ही है~

लड़की के अंदर पानी नहीं, बहुत कुछ उबाल मार रहा था।

और अचानक उन्होंने लड़की की माँ को कहा, देखिये, आपकी बहू कैसे काम कर रही है, हमें भी वैसी ही चाहिए।

लड़की: *मन में - ये तो जनरल एटीकेट है कि किसी के घर कोई जाएगा तो कोई ना कोई तो काम करेगा ही। तब जबकि लड़की और उसकी माँ को आपने अपने पास बिठा रखा हो।*

और अचानक द्विअर्थी सरकैस्टिक बातों से तुलनात्मक अध्ययन किया जाने लगा । आपकी बहू बहुत अच्छी है, कहाँ की है, जैसे वाक्य। साफ़ लग रहा था कि वो लड़की को एक झटके में नीचा दिखाने का पूरा प्रयास कर रहे हैं । ख़ैर, पकौड़े खाये गये, डकार मारे गए।

विदाई हुई ।

लड़की: आपने उनको बताया नहीं था कि मुझे जॉब करनी है!
लड़की के पिता: बताया था, उसके पिता और चाचा को बार बार बताया है।
- तो उन्होंने अपने घर की औरतों को नहीं बताया क्या!
- बताया होगा, शायद सोचा हो पैसे का दम दिखा कर ग्रिल किया जाए ।
- ये टॉर्चर था मेरे लिए, बहुत बड़ा टॉर्चर था। इनका लड़का करता क्या है?
- कुछ नहीं । अपना बिज़नेस है और इकलौता है तो वही संभालेगा ।

*शोर शोर शोर शोर शोर भयंकर शोर... शांति*

[दोनों परिवारों की मुलाक़ात तीन साल पहले भी हुई थी, तब बात आयी-गयी वाली हो गयी। कुछ महीनों से लड़के के पिता दुबारा मुलाक़ात करने की बात कर रहे थे । इसलिये समाज और बिरादरी वाला संस्कार निभाने के लिए आमंत्रण दिया गया.. आमंत्रण क्या, उन्होंने ख़ुद को आमंत्रित कर लिया। शायद उन्हें लगा हो, लड़की अब तक कुंवारी है तो उनकी बात मानने को तैयार हो जाएंगे।]

Sunday, June 26, 2016

उड़ता पंजाब

रिव्यू नहीं है, एक सिनेमा देखी, उसका एक्सपीरियंस है। फिर भी, स्पॉयलर नाम की चिड़िया का खौफ़ होता है तो अपने रिस्क पर पढ़ें।
पीएस: मैं कोई फ़िल्म देखने के पहले किसी तरह का भी कोई रिव्यू नहीं पढ़ती।

टिकट:
पीवीआर काउंटर पर मेरे आगे दो लोग खड़े थे, जब मैं पहुँची तब, 'मैडम कितने टिकट?'
एक
आई कार्ड दिखा दीजिये ।
क्यूँ? (मैं हैरान थी कि मेरे पहले वाले लोगों से उसने आईकार्ड क्यों नहीं माँगा)
एज देखनी होती है मैम 
मैं आईकार्ड देते हुए *swag में* - आय ऍम ट्वेंटी एइट ।

गुस्से से मैं काउंटर से निकल तो आयी कि उसने मुझे 18 के नीचे क्यूँ समझा, फिर बत्ती जली और लगा अरे ये तो कॉम्प्लीमेंट था..भला हो उस इंसान का ।

पंजाब:
गाड़ी चल रही है । टॉमी सिंह और उसके भाई गाने की डील खत्म करने वाले क्लाइंट को फोन पर गालियाँ बक रहे हैं । अचानक उसकी गाड़ी इनकी गाड़ी के बगल में दिखाई देती है । बाकी फ़िक्र छोड़ टॉमी का भाई उसे चिल्लाकर कहता है, "ओये तूने एस-क्लास कब ली?" वो भी तब  जब वो सारे ख़ुद रेंज रोवर में सवार थे । गाड़ियों का क्रेज़ पंजाब की रग रग में बसा है ।

आलिया:
आलिया की पहली दो लाइन सुनकर लगा कि यार कैसी बिहारी बोल रही है। लेकिन अपने दूसरे सीन तक आते आते आलिया ने पूरी कमांड बना ली। कई जगहों पर लगता रहा कि ये बिहारी वाला एंगल एक्स्ट्रा हो गया शायद, शब्दों पर कम पकड़ और बिहारी इन्फ्लुएंस ना मिल पाना वजह रहा हो, लेकिन आलिया के अभिनय ने उन गलतियों को नज़रअंदाज़ करने पर मजबूर कर दिया। खंडहर और पुआल के ढेर पर टॉमी सिंह से बातें करते हुए आलिया ने आधी जान ले ली और आधी जान तब जब वो अपने शरीर में सुई भोंकने वाले को चादर से ढँक कर कील से भोंक भोंक के मार डालती है। बस, एक बार को यह लगा कि जब पंजाबी किरदार के लिए आप पंजाबी एक्टर्स को ले सकते हैं, तो बिहारी किरदार के लिए किसी बिहार के एक्टर को क्यूँ नहीं ! आख़िर, बिहार में हर कोई ओवर एक्टिंग नहीं करता, कोई तो सच्चा मिल ही जाता ।

टॉमी सिंह:
आश्चर्य है लेकिन फ़िल्म में टॉमी एक इंसान का नाम है और जैकी चैन एक कुत्ते का। लेकिन हाँ, टॉमी वो ही शख़्स है, जो हमारा दूसरा चेहरा है.. जिसे हम छुप-छुपाकर घूमते हैं। हमारा वही दूसरा चेहरा जो लाउड है, इसलिए पहली बार टॉमी को देखकर खीज आती है। और मेरे हिसाब से सबसे गहरा सीन वो रहा जब टॉमी टॉयलेट पॉट के पानी में अपना चेहरा देखकर चीख रहा होता है..गबरू को ढूंढ रहा होता है.. कितनी तड़प होगी ना उस इंसान में जो संडास में अपना चेहरा देख रहा हो, उससे पूछ रहा हो। (पता नहीं, मेरे फेलो-ऑडिएंस को इस सीन में भी क्यूँ हँसी आ रही थी)।
और दूसरा तब जब वो बिहारन आलिया को ढूँढने निकलता है, इक कुड़ी गाता है.. फिल्मी सीन है, पर क्या हमलोग कम फिल्मी हैं।

उड़ती ऑडियंस:
पूरी फ़िल्म के दौरान थिएटर में बैठे लोग ठहाके लगाकर हँसते ही रहें । कई बार मुझे समझ नहीं आया कि ये लोग हँस क्यूँ रहे हैं! किसी समान लेकिन गहरे सीन पर, बहन** की गालियाँ आते वक़्त, आलिया के बिहारी बोलने पर और इतना कि क्लाइमेक्स तक इनके ठहाके आते रहे । हो सकता है उनके लिये इस फ़िल्म में बहुत कुछ फनी चल रहा हो, लेकिन मुझे इस बात ने बहुत परेशान किया । वो गाली, जो इतनी आम है कि सगी बहन जैसी लगती है, उस गाली को परदे पर सुनकर इतना भी क्या हँसना । वो तो रोज़ का चुटकुला है, अगर कुछ करना ही है तो इस तस्वीर पर परेशान होने की ज़रुरत है । इसलिये अगर आप प्लान कर रहे हैं, तो आधी रात वाला शो देखने जाएँ, जहाँ लोग भी कम हो और शायद समझदार भी।

सरताज:
काफ़ी दिनों बाद परदे पर कोई दिखा जिसकी आँखें इतनी ख़ूबसूरत हो। आख़िरी सीन, सरताज सारे फ़ाइलों को देख रहा होता है और बल्ली उसके सामने ज़मीन पर बैठकर फूट फूटकर रो रहा होता है। बल्ली के आँसू सरताज की नसों में बहते हुए से मालूम होते हैं, करीबन पचास-साठ सेकंड तक चले इस सीन को दुबारा-तिबारा-कई बारा देखा जा सकता है।

उड़ती बात:
ऐसी फिल्में बनती हैं तो और ज़्यादा बननी चाहिए.. लोगों को प्लॉट-कहानी नहीं समझ आती तो उनको समझनी चाहिए.. अगर स्क्रीन पर बिहारी बोली और बहन** की गालियाँ सुनकर हमें हँसी आती है, तो हमें परेशान होना चाहिये.. और सोचना चाहिये, गूगल करना चाहिए कि क्या सच में स्थिति इतनी ख़राब है.. एक शहर नहीं, दो शहर नहीं, पूरा का पूरा राज्य और उसकी युवा पीठी इस कदर नशे में उड़ रही है !

Monday, March 2, 2015

आपका टाइमपास करना हमारे लिए घातक हो जाता है । माना कि हमने भी आपके इनबॉक्स में लगातार संदेश भेजे.. लेकिन हमारे इनबॉक्स में आपका संदेश आते रहना, हमें किसी ख़याली पुलाव पकाने के लिए मजबूर कर देता है । आपको पता होता है कि आप ये सब महज़ अपने समय को काटने के लिए कर रहे हैं (जो नज़रिया आप साफ़ नहीं करते).. लेकिन हमें बेवजह कोई बेवकूफ़ाना खेल खेलने की आदत नहीं होती तो इसलिए हम आपकी इस कला को समझ नहीं पाते । बेहतर हो आगे के लिए आप की जमात ये बात समझ लें (पूरे आदर के साथ कह रहे हैं) । वो क...्या कहते हैं, डिच करना.. ब्रेक अप होना.. इन शब्दों से दूर हैं हम.. पर इन सब वक़्त पर उठी भावनाओं से भी ज़्यादा ख़तरनाक भावनाएं हमारे अंदर उठती है, जब हमें ऐसी किसी परिस्थिति से गुज़रना पड़ता है । उसपर भी आपका सवालों से दूर भागना.. और हमसे अपने लिए दुआ मांगना, हमें हमारी औरत होने की गरिमा याद दिलाता है । औरत हैं तो, दुआ देने का ठेका हमने ही ले रखा है क्या! चाहे आपने हमारी भावनाओं का कबाड़ा ही क्यूँ ना किया हो । आप कहेंगे, हमने भी तो बातों में मज़ा लिया था । क्यों ना लेंगे, हमें अपना नज़रिया कुछ और लगा था.. आपका नज़रिया दूसरा था । वैसे भी हम औरतें बातों-बातों में यूँ ही 'किसी' से भी अपनी सारी बातें नहीं कह जाते.. इस बात की समझ आप को अच्छी तरह होनी चाहिए थी । इसके बाद भी ऊँगली हमारी अस्मिता पर ही उठेगी.. सवालात होंगे .. कहा जाएगा तुम्हारी ही गलती रही होगी । और फ़िर, आत्मग्लानि का मंथन । ख़ुद से सवाल- कहाँ चूक हो गयी.. हमें ही बात नहीं करनी चाहिए थी शायद.. जवाब नहीं देना था । मतलब दोनों ही परिस्थितियों में सवाल हम पर और हमारा सवाल ख़ुद पर..!

Saturday, February 21, 2015

इश्क़ में शहर होना

हमें रवीश कुमार के कार्यक्रम में शिरकत करना बहुत पसंद आता है । लेकिन जब वो भीड़ से घिरे होते हैं तब हम भी दूर ही खड़े रहकर रवीश कुमार और उनके फैंस की आशिक़ी देखते रहते हैं । अक्सर ही सेमिनारों में किनारे या पीछे वाली  सीट पर बैठकर उन्हें सुनना अच्छा लगता है.. (बीच में आप स्टॉकिंग भी कर लें तो किसी को कुछ ख़ास पता नहीं चलता) । ख़ैर, आज पुस्तक मेले के एंट्री गेट पर ही तीन-चार लड़कियों के हाथ में "इश्क़ में शहर होना" देखकर बेहद ख़ुशी हुई.. ऐसा लगा कि शहर भर में इश्क़ फैल चुका है । स्टॉल पर पहुंची तो किताब पर ऑटोग्राफ़ लेने वालों की लंबी लाइन । मैंने इस सुनहरे मौके का लाभ मेले के पहले-दूसरे दिन ही ले लिया था, इसलिए मैं एक बार फिर दूर ही खड़ी रही । रवीश कुमार कभी किताब पर साइन करते तो कभी ख़ुद ही माइक लेकर लोगों को बुलाने लगते । - " कौन स्टॉल नं है जी ये? अच्छा 2 3 7 . जी, नमस्कार मैं रवीश कुमार बोल रहा हूँ.. सबलोग हॉल नं 12 के स्टॉल नं 237 पर आ जाए.. अच्छा लगेगा आप सब से मिलकर ।" सहजता इतनी कि सेल्फी लेने वालों को डपट भी रहे हैं तो यह कहकर कि सेल्फ़ी एक राष्ट्रीय रोग है.. आओ दोस्त.. खिंचवा लो । मैंने सोचा आज मेरा मिलना शायद मुमकिन नहीं । इसलिए निकास गेट पर एक ओर खड़ी हो गयी । सर निकले तो उनकी एक जानने वाली को पांच मिनट चाहिए थे और मैंने कहा, "सर, मुझे भी दो मिनट।" "अच्छा, तो कुल मिलाकर 7 मिनट हो गए ।" पर सबके चहेते लप्रेककार सेल्फ़ी और फ़ोटो खिंचवाते खिंचवाते दुबारा स्टेज पर चले गए । हम भी हिले नहीं.. वहीं खड़े रहे । दुबारा बाहर आएं तो संपादक महोदय ने मुझे (बहुत प्यार से) सीधे मना कर दिया कि नहीं, तुम आज नहीं मिलोगी। लेकिन हमें तो मिलना ही था । बात कुछ ऐसी थी.. और भी बहुत कुछ थी। एक तोहफ़ा था, जो देना ज़रूरी था । बाकी तो ख़ास बातें हैं । पप्पाराज़ी कुछ ज़्यादा ही हो रही थी । रवीश कुमार को ही कहना पड़ा, "भई, हमें भी तो मेला घूमने दीजिये.. हमें भी किताबें खरीदनी है ।" जान बचाकर बचते बचाते निकले सर जी ।

प्रेम व्यक्तित्व से होता है । हमारा प्रेम इस शख़्स के व्यक्तित्व से है । हमने कभी इन्हें नज़दीक से जाना नहीं । पर दूर से समझने की कोशिश करते रहते हैं । इन्हें हम हर मंच पर बोलते देखना चाहते हैं.. न्यूज़रूम में सबको डपटते देखना चाहते हैं.. भीड़ को बुलाते भी.. भीड़ से बचते भी ।

(मेले की झलकियों पर बहुत कुछ लिखना है.. समय मिलते ही। वैसे कुछ बातें बेहद अपनी लगती हैं.. जिन्हें किसी के साथ बाँटने का मन नहीं करता। फिर भी ये निजी बात लिख दी है)

Wednesday, February 18, 2015

उस पार...

चलना इन सीढ़ियों के पार कभी
हवा के सुकून में बहना कभी


उस पार,
किले की दीवार का एक परदा होगा
ज़माने भर की बेताब निग़ाहों से छुपाता होगा
उस पार,
एक पूरा दिन अपना होगा
एक पूरे साल का बसंत होगा


चलना इन सीढ़ियों के पार कभी...
इस तरफ़ सारी रस्में होंगी
उस ओर सिर्फ़ राहतें होंगी
इस तरफ़ सारी शिकायतें होंगी
उस ओर सिर्फ़ मोहब्बतें होंगी


इस तरफ़ बाहर-भीतर का शोर होगा
उस ओर सिर्फ़ हम दोनों की साँसें होंगी
चलना इन सीढ़ियों के पार कभी...
उस ओर मेरी उड़ती ज़ुल्फ़ें होंगी..
और मुझे निहारते तुम होगे..
उस ओर सिर्फ़ हम होगे..
सिर्फ़ हम होंगे..




फोटो क्रेडिट मुझ ही को जाता है।  तस्वीर दिल्ली से सटे आदिलाबाद क़िले की है।










 

Wednesday, December 10, 2014

ख़त में लिपटी रात... (३)

चोर हो तुम । हाँ, कोई संबोधन नहीं देना है मुझे तुम्हें.. हर बार कोई ख़त ना लिखने का फ़ैसला करती हूँ, लेकिन हर बार कुछ लिखने का मन कर जाता है । तुम्हें भी हर बार मुझे नाराज़ करने की आदत पड़ी है । जानबूझकर नाराज़ करते हो ना मुझे? बस, नाराज़ करके छोड़ देते हो.. एक दफ़ा याद भी नहीं करते । तुम्हीं ने एक बार कहा था ना कि मुझे नाराज़ होने का बहाना चाहिए.. यही समझ लो, पर इस बहाने के बहाने प्यार से गले लगाने भी नहीं आओगे, ये कहाँ पता था ! प्यार करते भी हो मुझसे और नहीं भी । पास चाहते भी हो और नहीं भी । इसलिए कहती हूँ चोर हो तुम । प्यार करते हो तो फिर बताते क्यूँ नहीं ! ऐसा कौन सा तूफ़ान आ जाएगा इज़हार करने से ? चुप छुप के अपनी नज़्मों में मुझे लिखते हो और पूछने पर कहते हो कि मैं किसी के लिए कुछ नहीं लिखता । फिर अब अपनी हर नज़्म में मुझे क्यूँ सजाते हो ? तुमसे अब बात नहीं करती फिर भी याद नहीं करते मुझे । तुम्हारे कुछ बोलने से मुझे कितनी ख़ुशी होगी, ये बेहतर जानते हो तुम । फिर भी । मेरी लंबी बातों का अब भी दो शब्दों में जवाब देते हो तुम । ज़्यादा बोलने से ज़बान जलती है क्या तुम्हारी ! चोरों की तरह चुरा लिया । और चोरों की तरह प्यार करते हो । साथ रहते भी हो पर पास नहीं रहते । अब कहोगे, प्यार नहीं करता । अगर प्यार नहीं करते तो इतना याद क्यूँ आते हो ? मांगने पर भी कुछ नहीं दिया तुमने मुझे । पूछा तक नहीं । तुम मुझे कुछ दे ही नहीं सकते । सिवाय इस अजीब से एहसासात के । तुम मुझे कुछ नहीं दे सकते... प्यार भी नहीं ।

Tuesday, December 2, 2014

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी...

पहली बार ऐसा हुआ है
कि  पहले  'उन्वान'* लिखा है
फिर नज़्म को सजाना चाहा है
वो शायद इसलिए कि
तुम्हारे-मेरे साथ का आख़िरी
मकाम यही होना है
एहसास ये  है
कि तुम्हें आगे बढ़ जाना है
और मुझे तुम्हें खो देना है
अब किसी और बात का
न इसरार^ होगा ना कोई तवक़्क़ो होगी
अब तुम्हारे दर पर ये मेरे कुछ 
आख़िरी ख़तों की दस्तक होगी ।

मेरी रूह ने तुममें
कोई अपना महसूस किया था
उस पागल ने तुम्हें
बेइंतहा अपनापन दिया था
तुम्हारे नाम को भी
अपने नाम के साथ सजाया था

तुम भी इक दफ़े
आये थे बहार की तरह खिलते हुए
मुझ डाली को
अपनी बाहों में समेटने के लिए
उस शाम जब
तुमसे शर्माने का नज़ारा होता था
तभी मेरा
ख़ुद से ख़ुद ही में सिमटना होता था
वो तुम्हारे साथ
मेरी रूह का आख़िरी सुक़ून था ।

न जाने हवाओं से कहकर
तुम्हें कितने पैग़ाम पहुँचाये फ़िर
सारे मौसमों को
तुम्हारे घर का पता भी बताया था
न जाने क्या क्या
उन ख़तों में लिखकर भेजा है मैंने तुम्हें
कोई हर्फ़ ना लिखकर भी
बहुत कुछ कहा है तुम्हें
मैं कहते कहते थक गयी
तुम चुप ही रहे
मैंने तुमसे चुप रहने की आदत जब सीख ली
तुम फिर भी ख़ामोश ही रहे ।

अब तुम्हारी नज़्मों में
जो ख़्याल उड़ता है उनमें
अपनी शक्ल ढूंढती हूँ मैं
तुम्हें पास लाने का ख़्वाब
फिर सताने लगता है
तुम्हें भूलने का इरादा
ज़रा सा डगमगाने लगता है
पर तुम बेफ़िक्र रहना
मेरे ख़त तुम्हें अब परेशान नहीं करेंगे
आख़िरी तोहफ़ा
बग़ैर किसी ख़त के भेजा है तुम्हें ।
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*शीर्षक
^ज़ोर देना या ज़िद करना