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Friday, June 20, 2014

वाशिंग मशीन

वाशिंग मशीन,
क्यूँ कर दी जाती है
बेदखल इस तरह
क्यूँ रख दी जाती है
बालकनी के एक कोने में

घर के बाकी इलेक्ट्रॉनिक
सामानों से अलग
चुपचाप एक कोने में बैठी
वाशिंग मशीन कह रही है
मुझसे ये सौतेला व्यवहार क्यूँ

हम भी तो इसे
पराये की तरह
इस्तेमाल करते हैं
सारे कपड़े इसमें डालकर
घर के अन्दर चले जाते है
मशीन बेचारी खुद ही
कपड़े साफ़ करती है
फिर कपड़े ले जाने को
सायरन बजाती है

हम भी अपना काम बनाकर
मशीन को कवर चढ़ा आते हैं
फिर कुछ घंटों-दिन के लिए
रहती है अकेली
हम कब वाशिंग मशीन का
हाल पूछ कर आते हैं ?


Wednesday, June 18, 2014

मेनोपॉज

आजकल बहुत थकावट रहती है
बेचैनी भी होती है
मनोदशा में बदलाव होता है
शरीर में शिथिलता है
ये मेनोपॉज का दौर है
जिससे मैं गुज़र रही हूँ

एक स्त्री का शरीर
अपनी तमाम संभावनाओं
को समाप्त कर रहा है
जैविक बुढ़ापा कहते है जिसे
उस पीड़ा को
सहन कर रहा है
शरीर बूढ़ा नहीं हुआ
पर शारीरिक मजबूती
हर दिन हार रही है
मुझे इस वक़्त
तुम्हारे साथ की
बहुत ज़रुरत है
मेरी मन:स्थिति को समझो
मुझे हारने मत दो

इस वक़्त मेरा शरीर
तुम्हारी इच्छाओं को
पूरा कर सकने में असमर्थ है
शायद मेनोपॉज के इस दौर
के बाद
मेरी शारीरिक इच्छाओं का भी
अंत हो जाए
उस वक़्त मुझे तुम्हारी
और भी ज़्यादा ज़रुरत होगी
तुम्हारे साथ की चाह होगी
मुझे समझने की कोशिश करना
मुझे हारने मत देना

एक स्त्री को मिले
'रजस्वला' के सबसे
बड़े वरदान का
यह अंत होने का समय है
यह एक स्त्री के जीवन का
परिवर्तनकाल है
यह कुछ सालों का
कष्ट है
जिसे भुगत कर
मैं एक बार फिर
अपने जीवन में
दृढ़ बनकर लौटूंगी
तब तक
मुझे हारने मत देना ।

(स्त्रियों में मासिक धर्म के स्थायी रूप से बंद होने को Menopause या रजोनिवृत्ति कहते है । जो कि ४०-५० की उम्र के आसपास होता है । अलग-अलग स्त्रियों के शारीरिक बनावट के हिसाब से यह होता है। कई बार इस परिवर्तन के समय कुछ स्त्रियों को बहुत कष्ट होता है ।जिसमें एक दो वर्ष तक लग जाते हैं ।)

Tuesday, June 17, 2014

युवती

लेबर रूम के बाहर खड़ा राजेश हाथों को मलते हुए इधर से उधर टहल रहा था । अरुणिमा अन्दर थी.. संसार के सबसे सुखद दर्द का अनुभव करते हुए । छह साल बाद ये दूसरी बार था जब वो ये सब अनुभव कर रही थी । छह साल पहले उत्कर्ष उसका नया जीवन बनकर इस दुनिया में आया था । डॉक्टर ने बाहर आकर खुशख़बरी दी, लड़की का जन्म हुआ है (आजकल उसे बेबी गर्ल कहा जाने लगा है) । राजेश ने डॉक्टर को हल्की स्माइल देकर थैंक यू कहा.. पर ख़ुशी से उछला नहीं । हॉस्पिटल में घर के बाकी लोग थे, तो राजेश ने अपनी भाभी को कहा, "ऑफिस से होकर आता हूँ.. तीन-चार घंटे में आ जाऊँगा" ।

इधर अरुणिमा को मैटरनिटी  वार्ड में शिफ्ट करा दिया गया था । पास में उसकी सम्पूर्णता का प्रतीक..उसकी नन्हीं कली, मुट्ठियाँ बंद किये आराम से सो रही थी । वो उसे देख कर मुस्कुराने लगी.. दिल से आने वाली मुस्कराहट की कोई परिभाषा नहीं होती.. बस ये कि अरुणिमा उस वक़्त इस संसार में ख़ुद को सबसे ज़्यादा ख़ुश महसूस कर रही थी । वो अभी अभी दुनिया में आयी अपनी बेटी को ध्यान से देखने लगी । फिर उसने राजेश को ढूँढा..वो चाहती थी कि इस वक़्त वो सबसे पहले अपने पति से मिले..लेकिन अरुणिमा ने भी काम ज़रूरी समझते हुए इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा।


इस बीच कमरे में घर के लोग आते-जाते रहे.. बीच-बीच में जब वो अकेली होती बस एकटक बच्ची को देखती रहती... कुछ याद करती रहती । देखते-देखते वो उसके होंठों के नीचे वाले हिस्से पर अपनी तर्जनी से गुदगुदी लगाती और खुद ही खिलखिलाकर हँसने लगती.. उसकी भींची मुट्ठियों के बीच अपनी ऊँगली के लिए जगह बनाती और उसकी मुट्ठी में अपनी ऊँगली पकड़ा देती ।
कितने दिनों से तो वो इंतज़ार कर रही थी इस पल का.. एक बेटी को जन्म देने का । दूसरे बच्चे के लिए राजेश तो राज़ी ही नहीं था, पर अरुणिमा की बस एक यही ख़्वाहिश अधूरी थी कि वो एक बेटी की माँ बने । समझाते-समझाते अपनी बात मनवाने में अरुणिमा को कुछ साल ज़रूर लगे, पर इस बीच उसने अपनी बेटी के लिए बहुत कुछ सोच लिया था..जो अभी तक इस दुनिया में आई भी नहीं थी । मन्नतों का सिलसिला भी जारी रहा.. जो प्रेगनेंसी के दौरान तक चला । अभी जब अरुणिमा ने अपनी ऊँगली अपनी बेटी की मुट्ठी में फंसाई हुई है, तो उसे लग रहा है उसने अपनी बेटी को नहीं, बेटी ने उसे जन्म दिया है । जन्म ही तो दिया है.. एक माँ को.. एक बेटी की माँ को

मुस्कुराते हुए अरुणिमा अपने प्रेगनेंसी के दिन याद करने लगी.. क्या-क्या तैयारियां कर ली थी उसने । उसे बेटी की इतनी ख़्वाहिश थी कि उसने नाम तक तय कर लिया था । राजेश से इस बारे में कई बार उसने पूछा, पर पति जी इस मसले पर ज्यादा इंटरेस्टेड नहीं थे । कितने सारे नाम सोच रखे थे, घर में किस नाम से पुकारेगी वो उसे - 'गोरैया' या 'चिड़िया', जो इधर से उधर फुदकती रहे या फिर 'अनोखी' । हमारे यहाँ तो बच्चों के दो नामों की परंपरा हैं ना, इसलिए उसने भी अच्छे वाले नाम के लिए 'आद्या' भी सोच रखा था.. 'अनन्ता' भी और 'विदिशा' भी । अभी अपनी बेटी को देखते हुए वो समझ ही नहीं पा रही थी कि कौन सा नाम सबसे सुन्दर होगा उसके लिए । उसने सोचा, चलो राजेश आ जाए फिर इस बात पर सोचेंगे । ज़्यादा हुआ तो पर्चियाँ उछाल लेंगे । हमारे देश की ये सबसे अच्छी बात है, हम किसी भी समस्या का समाधान पर्चियाँ उछाल कर आराम से कर लेते है ।



इस बीच कमरे में उसका बेटा उत्कर्ष दाखिल हुआ.. पिछले कुछ महीने में उसने अरुणिमा से न जाने कौन-कौन से सवाल कर लिए थे । अरुणिमा ने भी उसे बड़ी ही सहजता से बता दिया था कि इस फूले हुए पेट के अन्दर उसकी छोटी बहन है । वो पूछता, "शोटी बेबी पेट के अन्दर खाना त्या खाती है ?" अरुणिमा हर सवाल का जवाब देती.. उसके हिसाब से हर कुछ समझाती.. ये भी कि वो अब बड़ा भाई बनने वाला है इसलिए उसे अपनी शैतानियाँ कम करनी चाहिए । अब जब वो अस्पताल के बिस्तर पर अपनी माँ और नयी बहन के साथ था तब भी उसके सवाल वैसे ही जारी रहे । पर थोड़ी समझदारी भी दिख रही थी.. वो सीधा बैठा था, और हलके से शोटी बेबी को सहला रहा था । अरुणिमा की आँखें एक बार फिर राजेश को ढूँढने लगी । बाहर पूछवाया तो पता चला कि बस आ ही रहे हैं। अब वो थोड़ा असहज होने लगी थी.. थोड़ा अजीब लगने लगा था उसे । उत्कर्ष के जन्म के समय तो वो मेरे साथ खड़े थे, इस बार क्यूँ नहीं ! वो इस सच से वाकिफ़ थी कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा बेटी के जन्म पर अब भी खुश नहीं होता । बड़े परिवार शायद ये ख़ुशी ऊपरी दिखावे की तरह दिखाते हों.. पर फ़र्क तो किया जाता है । लेकिन राजेश ? उसने फिर सोचा.. नहीं नहीं, राजेश ऐसे नहीं है । हाँ, हर बार मेरी बेटी की मांग वाली बात वो आराम से सुनते.. मुस्कुराते भी ... पर अपना पक्ष कभी साफ़ नहीं रखा । उसने फिर खुद को टोका कि नहीं वो गलत सोच रही है.. ऐसा नहीं हो सकता । राजेश भी बहुत खुश होंगे और मुझे खुश देखकर तो और भी ज़्यादा ।


वो अब फिर अपनी बेटी को निहारने लगी.. शांत, सारी उलझनों से दूर । अरुणिमा ने अपने जीवन के संघर्षों के बारे में सोचते हुए उसके माथे पर अपना हाथ फेरा और कहा कि मैं तुम्हें सारी उलझनों से दूर रखूंगी, मेरी बेटी ।
एक बेटी को जन्म देने का ख़्वाब उसने उस वक़्त से देख रहा था जब वो कुँवारी थी.. उस वक़्त अपनी माँ से इस बारे में चर्चा कर वो खूब हंसती । माँ भी खूब समझती थी कि उसकी बेटी शादी के बाद एक बेटी को क्यूँ जन्म देना चाहती है । माँ कहती, "मुझे पता है, तुम्हारी जो ख़्वाहिशें अधूरी रह गयी हैं..तुम उन सबको अपनी बेटी के मार्फ़त पूरा करना चाहती हो"। अरुणिमा भी मुस्कुराते हुए कहती, "हाँ, माँ । एक लड़की होकर बचपन से लेकर आजतक जिन भी चीज़ों के लिए तरसी हूँ.. मैं अपनी बेटी को वो सबकुछ देना चाहती हूँ.. ख़ासतौर पर... नए-सुन्दर कपड़े"। अरुणिमा ये सब याद करते हुए अब मुस्कुरा रही थी.. पर आँखों में समंदर भर आया था और गले में एक बड़ा पत्थर महसूस हो रहा था । उसने एक बार फिर अपनी ऊँगली बेटी की मुट्ठी में फंसाई, मानो सारी खुशियों की चाभी इन्हीं हाथों में हो ।


थोड़ी ही देर में राजेश कमरे के अन्दर आया । अरुणिमा ने जैसा सोचा था उस तरह से नहीं, बल्कि बिल्कुल सामान्य भाव से । राजेश पास आकर बैठा.. अरुणिमा से उसकी तबियत पूछी । बेटी की ओर देखा.. हलके से मुस्कुराया.. अरुणिमा अबतक शांत ही थी। अब राजेश ने अपना हाथ बेटी के सिर पर फेरा.. तो मानो अरुणिमा की जान में जान आ गयी हो । अब वो थोड़ा मुस्कुराई, पर फिर भी राजेश का ये सामान्य व्यवहार नहीं था, ये औपचारिकता पूरी करने जैसा था । हालांकि उन्हें अपनी भावनाएं ज़ाहिर करने में थोड़ी दिक्कत होती है.. पर इस वक़्त एक बार अरुणिमा को गले लगाना तो उनका फ़र्ज़ बनता था । अगर वो बेहद ख़ुश होते तो ऐसा ज़रूर करते.. पहले भी किया है.. कोई काम पूरा होने पर.. उत्कर्ष का जन्म होने पर ।


अरुणिमा से रहा नहीं गया, उसने पूछ लिया "तुम ख़ुश नहीं हो?" राजेश ने हाथों से शायद अपनी आँखें छुपाते हुए.. नज़रें नीची करते हुए "हूँ..खुश हूँ.." कहा । अरुणिमा ने एक लम्बी सांस ली, जैसे उसे एक ऊँची चढ़ाई चढ़नी हो..एक संघर्ष और जीना हो..और फिर मुस्कुरायी.. अपनी ऊँगली बेटी की मुट्ठी में फँसायी और एक हल्की नींद के लिए अपनी आंखें बंद की ... जैसे दोनों माँ-बेटी को कुछ प्लानिंग करनी हो ।
.............


(इस पोस्ट का श्रेय मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक और हमेशा ही प्रोत्साहित करने वाले अनुज जी को जाता है, जिन्होंने हमेशा ही मुझे गद्य लिखने को प्रेरित किया । साथ ही, इस टाइटल को भी सुझाया था और एक सीरीज़ लिखने को कही थी ।
तो आप सब के लिए "युवती" का यह पहला भाग प्रस्तुत है। इस सीरीज़ के अंतर्गत स्त्री के जीवन के विभिन्न पड़ावों पर लिखने की कोशिश करुँगी ।)

कुंठित पौरुष

एक स्त्री की देह है ये
और तुम्हारे लिए
बस एक खिलौना भर
अपनी उँगलियों को ऐसे
फिराते हो
जैसे उसकी देह हो
तुम्हारी संपत्ति
पूछा कभी उससे
जब वो बात करती है
तुमसे कुछ कहती है
तब तुम्हारा उसे किसी
भी जगह हाथ लगा जाना
कैसा लगता है
तुम्हारे शब्दों में कहूं तो
तुम स्त्री को किसी स्विच
की तरह दबाकर
"ऑन" करना चाहते हो

होगी तुम्हारे लिए
ये तुम्हारी सख्त़ ज़रुरत
लेकिन एक स्त्री के लिये
ये सम्पूर्णता का विस्तार है
तुमसे जुड़ने का त्यौहार है
पर तुम,
तुम्हें तो स्त्री की क्वालिटी
उसकी 'वर्जिनिटी' में
दिखती है
इस 'वर्जिनिटी' पर वार करके
तुम अपनी पौरुषता का दावा
पेश करते हो
तुम्हारे लिए तुम्हारा ये
स्वघोषित ईनाम
तुम्हें मर्दों की
फूहड़ता वाली श्रेणी
में मिलाता है
'वर्जिनिटी' पाकर
ख़ुद को विजेता समझने वाले
तुम अन्दर से सड़े-गले हो
कितने लाचार हो तुम
तुम्हारा पौरुष भी
एक स्त्री की देह पर निर्भर है
तुम्हारी मर्दानगी भी शेष
नहीं है तुममें
अन्दर से खोखले
बाहर से बीमार नर हो तुम

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Friday, June 13, 2014

दिल्ली का ऑक्सफ़ोर्ड

दिल्ली में इस देश का हर राज्य,हर शहर बसता है । लेकिन मुझे कल ही पता चला कि दिल्ली में अमेरिका भी बसता है । अमेरिकन सेंटर नाम की लाइब्रेरी तो यहाँ है ही । कनॉट प्लेस में टहलते हुए ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर नाम की एक जगह पर नज़र पड़ गयी। ज़ाहिर सी बात है, दिल्ली में ऐसी जगहों को हम ढूंढते रहते है और जब ऐसी अपने हिसाब की जगह दिख जाए तो बिना जाए कोई कैसे रहे.. सो जाना बेहद ज़रूरी हो गया । एंट्री पर ही किताबें सजी हुई थीं । फिर ये कुछ लिखा हुआ भी दिखा..पढ़ने की कोशिश कर सकते हैं ।

अन्दर चारों तरफ़ किताबें, एक सेक्शन में सिर्फ बच्चों की किताबें रखी हुई थी । हैरानी तो तब हुई जब अन्दर की ओर एक सेक्शन में कॉस्मेटिक्स रखे हुए थे । फिर दूसरी ओर देखा तो आम भी रखे हुए थे । मैंने पूछ ही लिया, पता चला सब बिक्री के लिए ही है। मुझे थोड़ी हंसी भी आई कि है तो बुकस्टोर और सामान रंग-बिरंगे बिक रहे हैं । लेकिन अच्छा भी लगा इस तरह का नया प्रयोग देखकर । हालांकि बाहर के देशों में ऐसी जगहें होती है ये तो सुना है । शायद ये कांसेप्ट भी वहीँ से आया हो। तो मैंने भी पूरे खुले दिल से ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर के ओनर को उनकी इस नए प्रयास के लिए nice concept कहते हुए कॉम्पलिमेंट दे दिया ।





उधर दूसरी साइड में हलके परदे के बाद चार-पांच टेबल और कुर्सियां लगी हुई थी  और आर्डर करने के लिए एक छोटा सा किचन । चाय-कॉफ़ी ऑर्डर कीजिये और आराम से आनंद उठाईये ।

मुझे बहुत अच्छी जगह लगी ये । अव्वल तो ये बुकस्टोर आपको दिल्ली में विदेश टाइप फील कराता है  और दूसरा कि चाहे आप किताबी कीड़े हो या ना हो, किताबो के शौक़ीन हो या किताबें सिर्फ पसंद भर हो तो भी आप यहाँ आराम से बैठ सकते हैं। आसपास किताबें हो तो किसे अच्छा नहीं लगता । ज़रूरी नहीं कि किताबें पढ़ी ही जाएँ ।किताबों के बीच रहकर भी अच्छा ही लगता है । फील गुड ।

Friday, May 30, 2014

अब्र और बूंद

आज बूंदों से कर ली जी भर की बातें
जो कुछ कहना था तुमसे
कह दी वो सारी बातें
वो भी कुछ कहानी कहती रही
झूम कर बरसती रही
तड़प के गिरती.. बिलखती
कुछ कहती फिर हल्के से मुझे चूमती

कुछ दिनों पहले की बात है
अब्र का एक टुकड़ा भी
आसमान में तुम-सा
ख़ामोश और सहमा पड़ा था
कभी-कभी हल्का गरजता
बूंदों से कुछ कहता
बूँदें रूठकर रोती हुई
ज़मीं पर चली आती थी

अब्र बूंदों की बात नहीं समझ पाता
बूंदें अब्र की ख़ामोशी नहीं पढ़ पातीं
अब्र गरज कर आँखें दिखाता रहा
बूंदें चुपचाप बरसती रही

अब्र भी टूटा है आज
बिखर कर ज़मीं पर गिरा है आज
बूंदों की तड़प समझ पाए शायद !

अब ढूंढ रहा दर-बदर
बूंद को हर इक पहर
बेख्याली में ये एहसास तक नहीं
बूँद को ढूँढने में
अब्र अब ख़ुद बूँद हो चला है...

अब्र* - cloud

Friday, May 16, 2014

बकबक - ३

कोई नहीं समझता आपकी बात को.. आपकी भावनाओं की कद्र भी नहीं करता कोई.. जिसके लिए भावनाएं है, वो ही नहीं समझता आपकी बात को । उनके सर में दर्द हो तो हमें तकलीफ़ होती है, हम चाहे तबियत की किसी भी हालत में हो, उनसे कोई उम्मीद नहीं कर सकते । हमारी गलती यही है कि हम जिसको अपनी सोच में रखते है, वो कभी हमारे मन का कुछ कहे..बस ये उम्मीद लगा ली । जैसे ही उन्हें सामने देखते है, लगता है कितनी ज़ोर से गले लग जाएँ.. सब बातें कह जाएँ । कभी-कभी हम दिल की वजह से बहुत मजबूर हो जाते है । क्यूँ किसी को इतना अपना समझ बैठते है ? क्यूँ किसी को ख़ुद में शामिल कर लेते है ? ये मालूम होते हुए भी कि सामने वाला ना तो आपकी बात समझेगा.. और अगर समझ भी ले तो अपने सुरक्षा घेरे से कभी बाहर नहीं आएगा । सब को अपनी परवाह होती है ..कोई किसी की परवाह नहीं करता । अंत में, हार हमारे दिल की ही होती है.. हम ख़ुद से हार जाते है । और जब कोई नहीं सुनता, कोई नहीं समझता तो ऐसे ही बकबका देते है अपनी डायरी में या ब्लॉग पर ।
तबियत ज़्यादा खराब है..पिछली पूरी रात सो नहीं पाई थी.. आज दिन भर सोती रही.. रात को भी बहुत सोना है । भारत जीत गया है आज.. पर मैं ख़ुद से ही हार गयी हूँ ।