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Tuesday, July 15, 2014

ख़त में लिपटी रात... (२)

सुनो,

कुछ ना कहूं क्या तुमसे ? हर बार मेरी बात क्वेश्चन मार्क से ही क्यूँ शुरू होती है, तुम इसके लिए मुझसे नाराज़ हो सकते हो.. सवाल कर सकते हो । पर मेरी एक ही उम्मीद लगी है तुमसे कि तुम्हारा कुछ कहा, मैं सुनूं । अब इतनी भी उम्मीद लगाने की मेरी हैसियत नहीं, ये ना कह देना । सिर्फ़ इतना तो तुमसे चाह ही सकती हूँ । और किसी बात की उम्मीद मैंने छोड़ दी है । उस वक़्त से, जब ये एहसास हुआ कि मेरे और तुम्हारे बीच बहुत डिफरेंस है । सोच की नहीं, क्लास की । लोअर मिडिल क्लास और अपर क्लास की । गर हम दोनों मिल भी जाते तो पूरी ज़िन्दगी इस खाई को भरने में ही लग जाती शायद । मुझे मालूम है इस बात से तुम इत्तेफ़ाक़ नहीं रखोगे, क्यूंकि तुम्हारी सोच.. तुम्हारे ख़यालात बिलकुल मेरी तरह है। ज़मीं की मिट्टी की तरह । पर तुम्हारे आसपास बहुत चमक है, जिसके लिए शायद मैं.. 'परफेक्ट' नहीं । अब इन सबके बीच अगर मैंने तुमसे कुछ लफ़्ज़ों का नज़राना मांग लिया तो क्या गुनाह कर दिया ! मैं तुम्हें अपने बेहद क़रीब रखना चाहती हूँ । हाँ, तुमने बताया हुआ है कि तुम बंधे हुए आदमी नहीं हो.. पर मैं तुम्हें बांध कर नहीं रखना चाहती । बस, तुम्हारे किसी और से बंध जाने का डर है मुझे.. जो मुझे हर बार कमज़ोर बना देता है । मैं नहीं चाहती तुम्हारे सामने आना, पर तुम्हें एक झलक देखना मेरी ख़ुराक है । मैं तो बस तुम्हें महसूस करना चाहती हूँ.. तुम्हारे लफ़्ज़ों को सुनना चाहती हूँ.. जी भर के । यकीनन इतने भर से तुम्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा.. पर फिर भी एक बार अपनी ख़ामोशी तोड़कर, मेरे हाथों को अपना लम्स देकर.. कुछ कह जाओ.. कोई तो तोहफ़ा दे जाओ ।

मैं तुम्हारी कुछ भी नहीं.. मुझे एहसास है इस बात का । हर बार ख़त के आख़िर में अपना नाम लिख कर, मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती ।
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ख़ामोशी में तैरती इक रात..
तुम्हारे लफ़्ज़ों के इंतज़ार में
रफ़्ता-रफ़्ता गुज़र रही है ।

क्यूँ नहीं तोड़ देते तुम अपनी ख़ामोशी को
टुकड़ों-टुकड़ों में.. लफ़्ज़ों-लफ़्ज़ों में..
क्यूँ नहीं बिखर जाते तुम रेत की तरह
सांसों-साँसों में.. हाथों-हाथों में..

कब तक यूँ ही संगमरमर बने रहोगे
कब तक ख़ामोशी का इम्तिहान लेते रहोगे
इसे इत्मीनान नहीं..
अब मेरी ख़ामोशी डूब रही है

ख़ामोशी में तैरती इक रात..
तुम्हारे लफ़्ज़ों के इंतज़ार में
रफ़्ता-रफ़्ता गुज़र रही है ।

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Tuesday, July 8, 2014

अनजाने लोग

वर्कशॉप में वो मेरे पीछे वाली सीट पर बैठी थी । सुन्दर साड़ी, साड़ी का पल्ला चुन्नटों वाला नहीं था..एक पल्ला था (फ्री फॉल), मैचिंग चूड़ियां और बात करने का तरीका बिलकुल ठेठ । आरती प्रियदर्शिनी ।

इतनी साधारण, फिर भी इतनी आकर्षक । बाकियों का नहीं पता, पर मुझे नामालूम क्यूँ बार-बार इनसे बात करने का मन कर रहा था । पहले दिन तो आगे चुपचाप बैठकर, लंच टाइम में होने वाली इनकी बातचीत को मैं सुन रही थी । वर्कशॉप में सब एक-दूसरे से अजनबी थे, पहली बार मिल रहे थे.. इसलिए वो अपने आसपास बैठी बाकी महिलाओं से बातें करने लगी ।

"हम गोरखपुर से आये हैं।"
"गोरखपुर से दिल्ली सिर्फ इसी वर्कशॉप के लिए?"
"हाँ, और हम पहली बार दिल्ली आये हैं। बहुत मन करता है लिखने-पढ़ने का। गृहस्थी के काम से जब भी टाइम मिलता है, मतलब सब काम कर लिए ना, उसके बाद जो भी समय बचता है..उसमें लिखते है । पत्रिका तो हम खूब पढ़ते हैं..हिंदी पत्रिका । गृहशोभा में कुछ कहानियां भी छप चुकी है ।"
बाकी की महिलाएं गोरखपुर के बारे में पूछने लगी। उन्होंने मान्यता के अनुसार बताया, फिर कहने लगी, "हमारा मायका मुज़फ्फरपुर है । (ये सुनकर बातचीत में मेरा इंटरेस्ट जाग गया,चूँकि मैं पड़ोसी जिला की हूँ..शायद इसलिए) ये नाम भी मेरे दादाजी का ही दिया हुआ है । उनको इंदिरा जी बहुत पसंद थीं, इसलिए वो चाहते थे कि उनकी पोती भी कुछ करे..इसलिए उन्होंने मेरे नाम के आगे प्रियदर्शिनी लगा दिया है । (हँसते हुए आगे कहा) अब उतना कहाँ हो पाता है.. वहाँ तक पहुंचना मुस्किल है। इसलिए कहानी -लेख लिखकर अपना मन का कुछ करते रहते है ।"

उस दिन का सेशन ख़तम होने वाला था..मुझे जल्दी निकलकर एक हिस्टोरिक सेशन के लिए दूसरी जगह जाना था । इसलिए आरती प्रियदर्शिनी से मुलाक़ात अधूरी रह गयी ।

अगले दिन मैं लेट पहुंची.. पर आरती जी वहीं पीछे वाली रो में ही बैठी थी। आगे वाली सीट ख़ाली थी, इसलिए मैं दुबारा से उनकी बात सुनने के लिए वहीँ बैठ गयी । आज भी साड़ी वैसी ही पहनी हुई, गुलाबी रंग की । और चूड़ियां बदली हुई, साड़ी की मैचिंग । लंच-टाइम हुआ तो मैंने पीछे मुड़कर बात शुरू कर ही दी।

"हर साड़ी की मैचिंग चूड़ियां लेकर आई हैं आप?"
एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ उन्होंने कहा, "हाँ, हमको चूड़ी का बहुत शौक़ है । जहां भी जाते है, सब साड़ी का मैचिंग ले जाते हैं ।"
"तब तो चूड़ी का एक अलग बैग होता होगा!"
"हाहा, हाँ । मेरे पति को बहुत पसंद है.. इसलिए परेसानी नहीं होती ।"
शायद वो मेरी बात समझ गयी थी, कि पुरुष ज़्यादा लगेज बनाने पर और ढोने पर झल्ला जाते हैं ।
मैंने आगे कहा, "पहली बार दिल्ली आई हैं.. घूमी दिल्ली?"
"हाँ, कल यहाँ से निकलने के बाद लाल क़िला गए थे । पति- बच्चे इतनी देर के लिए कहीं आसपास चले जाते है। फिर शाम को हमको लेने आ जाते हैं । "
मैं पूछती रही वो बताती रही, उन्होंने ये भी नहीं पूछा कि मैं क्यूँ पूछ रही हूँ !!
"वैसे तो हम हर साल घूमने जाते हैं..हर साल घूमते है हम.. जब अपने तरफ सीतलहर चलता हैं ना तब हम पूरा साउथ इंडिया घूमते है ।"
निश्चित ही मुझे इससे लग गया था कि आरती जी के पति उन्हें बेहद प्रेम करते है.. तभी तो शीतलहर में कड़कड़ाती ठण्ड से बचाने के लिए, दस दिनों के लिए ही सही आराम की छुट्टी दे देते है ।

सेशन के दौरान उन्होंने सवाल भी पूछा तो इतनी आसानी से .. अपनी बोली में.. बिना हिचकिचाहट। अपने बगल में बैठी एक महिला, जिनके हाथ सूने थे.. आरती जी ने ना जाने क्या सोचते हुए एक कंगन अपनी बैग से निकालकर उन्हें दे दिया । कहा, पहनिए, हम आपके लिए ही लाये हैं ।

मुझे आरती प्रियदर्शिनी बहुत अच्छी लग रही थी । पीछे बैठे वो बोली जा रही थी और मैं कुर्सी पर पीठ टिकाकर, सिर को थोड़ा पीछे झुकाकर उनकी बात सुनकर मुस्कुरा रही थी । कई बार मंच पर बोल रहे वक्ता की बात से ज्यादा मुझे आरती जी की बात में रूचि हो रही थी ।  (और मुझे बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि इसका नतीजा इस ब्लॉगपोस्ट के रूप में आएगा ।)

Tuesday, July 1, 2014

ख़त में लिपटी रात...

(यह एक फिक्शनल ख़त है।)


सुनो,
         हाँ! मैं कब से तुम्हें ऐसे ही पुकारना चाहती थी और तुम भी मुझे ऐसे ही पुकारो, यही चाहती थी । ये ख़त इसलिए क्यूंकि ख़त लिखने का मौसम फ़िर से लौट आया है । सुना है, सबसे ज़्यादा प्रेम लिफ़ाफ़े में बंद इन्हीं लिखे शब्दों में झलकता है ।

मैं क्यूँ नहीं रह सकती तुम्हारे साथ ? मैं क्यूँ दूर जाऊं तुमसे या तुम मुझसे क्यूँ दूर जाना चाहते हो ? मुझे तो तुम्हारे साथ अपना हर वक़्त बिताना था.. सब बातें कहनी थी । तुम्हारी कुछ भी ना कहने की आदत सीखनी थी । मुझे तुम्हारे जैसा होना था ।

मैंने क्या चाहा था तुमसे, ये मुझे ख़ुद नहीं पता ! बस इतना कि मुझे तुमसे टोकरी भर बातें करनी थी और तुम्हारी कुछ बातें सुननी थी । तुम्हारे साथ सुबह की चाय, दोपहर का अलसाना, शाम की फ़ुर्सत, रात का महकना... ये सब गुज़ार सकूं, बस यही चाहा था । एक और चीज़ चाही थी, जो मुझे बेहद पसंद है.. कि तुम मुझे इअरिंग्स लाकर दो.. झुमके, बालियाँ..कुछ भी  या फ़िर चूड़ियाँ.. रंग-बिरंगी ।

जिस समन्दर के किनारे मैं कब से जाना चाहती हूँ.. वहाँ मैंने तुम्हारे साथ जाने का सपना देखा था । वहीँ किनारे किसी बेंच पर तुम्हारे साथ बैठ सकूं,तुम्हारे गाल नोंच सकूं, तुम्हें कस के गले लगा सकूं, रेत पर तुम्हारे पैरों पर अपने पाँव रखकर चल सकूं, लड़खड़ा सकूं, और तुम संभाल सको... बस यही चाहा था । पर मेरा ये सपना गीली रेत से बनाये उस घर जैसा था, जिसे समंदर अपनी लहरों के साथ बहा ले गया ।

ये सच है, मैं जो कुछ लिखती हूँ वो तुम्हें सोचकर लिखती हूँ । जो अनकही है, उन्हें लिखती हूँ । पर एक बात जो तुम्हें नहीं मालूम कि मैं तुम्हारा लिखा सिर्फ़ अपने लिए पाती हूँ । सिर्फ़ अपने लिए समझती हूँ.. इसमें कोई और रुख़, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता । तुम्हारे लिखे में हर बार मैं अपना नाम ढूंढती हूँ । ख़ुद से जोड़ लेती हूँ। तुम्हारी नज़र में यही मेरी गलतियां हैं.. पर मेरे लिए ये एक ज़रिया है, तुम्हें अपने क़रीब पाने का.. बेहद करीब..बेहद बेहद करीब ।

तुम्हारा लिखा पढ़ते वक़्त कई बार आँखें भर गयी है मेरी..कई बार मुस्कुराई हूँ मैं.. जैसे एक-एक शब्द मेरे कानों में सुना रहे हो तुम । आते-जाते.. सड़क पर या फिर मेट्रो में सफ़र करते हुए, जब भी तुम्हारा कुछ पढ़ा, मेरी भावनाएं मेरे बस में ना रही । ये सच है ये ख़्वाबों की दुनिया है.. पर ख़्वाब तुमने नहीं देखे क्या कभी ?

मुझे मालूम है हम दोनों नहीं मिल सकते । क्यूँ नहीं मिल सकते, इसकी समझ मुझ में नहीं । ये सब तो मेरा कहा है, मेरे दिल की बात है.. पर तुम्हारे दिल में क्या है, ये तुमने कभी बताया ही नहीं.. या बताना चाहा ही नहीं.. या फिर तुम्हारे दिल में मेरे लिए कुछ रहा ही ना हो ! बस यही एक तकलीफ़ है । पहले एक बार कहा था ना तुमसे कि जब मिलोगे, और मैं गले लगने आऊं तो मुझे झटकना मत.. तुमने वही कर दिया है.. झटक दिया मुझे । देखा नहीं, मैं कितना चहकती हुई सिर्फ़ तुम्हारे क़दमों की आहट सुन के दौड़ती-भागती चली आई.. बस मुझे आता देख तुमने अपना मुंह फेर लिया ।

मैंने कई बार खुद को तुम्हारे पास पाया है .. नहीं.. नहीं ! तुम्हें अपने पास महसूस किया । ख़ुद को कैसे भेज दूं तुम्हारे पास?.. उसकी इजाज़त तुमने कहाँ दी है ! पर क्या तुमने मुझे अपने आसपास कभी महसूस नहीं किया !!! मुझे ये भी कभी समझ नहीं आया कि यूँ ही बैठे-बैठे.. या कोई दूसरा काम करते हुए मेरे दिल से तुम्हारा नाम कैसे निकल जाता है ! हंसी आएगी तुम्हें..पर कई बार होंठों से भी अकेले में तुम्हारा नाम पुकार देती हूँ । मुझे नहीं मालूम, मेरा दिल इतना पावरफुल कैसे हो गया ! शरीर के सारे अंगों में सबसे ज़्यादा मज़बूत । और अब तुम्हें ये छोड़ नहीं पा रहा.. दूर नहीं कर पा रहा.. हर बार एकाधा बातें कहने की फ़िराक़ में रहता है । तुमसे अलग होना इसके लिए कमज़ोरी की बात है ।

पिछला सावन भी हरा नहीं था.. सादा ही गुज़रा । इस सावन से फ़िर से ढ़ेर सारी उम्मीद लगाए बैठी हूँ.. शायद बूंदे मेरे लिए कोई पैग़ाम लेकर आये । जिसे पाकर मैं हँसते हुए रो सकूं या रोते-रोते हंस सकूं ! जैसे अभी कुछ बूंदे डायरी के पन्नों पर आ गिरी है.. ये सावन मेरे लिए इस बार शायद और हरा हो जाए ! और कुछ नहीं, तो एक ख़त ही मेरे नाम से भेज देना जिसे मैं तुम्हारी आवाज़ में पढ़ सकूं ।

ये तोहमतें नहीं है.. ना ही शिकायतें हैं.. इसे भी मेरे प्यार का एक अंदाज़ ही समझना । तुम जैसे रहना चाहते हो, वैसे ही रहो । मुझसे दूर । पर तुम मेरे क़रीब हमेशा रहोगे.. क़रीब नहीं, तुम तो मेरे अन्दर रहते हो । तुमसे जुदा होना मुश्किल है.. लेकिन तुम्हारे साथ रहना सांस लेने जैसा है । बेहतर है सांस लेती रहूँ.. धीमे-धीमे तुम्हें महसूस करती रहूँ । तुम्हारी ख़ामोशी को पढ़ती रहूँ और समझने की कोशिश करती रहूँ ।

नहीं नहीं करते-करते देखो मैं कितना बोल गयी.. आजकल मौसम ही ऐसा है.. सच ज़ुबान पर आ ही जाता है । सुनो, अब ज़्यादा नहीं लिख सकती। ख़त हैं ना, क्या पता उड़ते-उड़ते किसी के हाथ लग जाए.. कोई और पढ़ ले !



तुम्हारी,
मुझे तो ये भी नहीं पता मैं तुम्हारी क्या हूँ !! इतना पता है कि बस तुम्हारी हूँ, चाहे तुम मुझे अपना समझो..ना समझो ! इसलिए इस बार इसे ख़ाली ही रहने देती हूँ ।

.............

 

Saturday, June 28, 2014

वीकेंड

हफ़्ते भर की थकान दूर करने
आने वाले हफ़्ते का मेकओवर करने
लो आ गया तुम्हारा वीकेंड ।

जागो,
आज तो नींद जल्दी खुलेगी तुम्हारी
वीकेंड के कीमती पलों को
यूँ ही कैसे गुज़ार दोगे !

जागो कि हफ़्ते भर से रखे
एडिटोरियल पेज तुम्हारे इंतज़ार में हैं ।
जागो कि फ़ोन में सेव किये
रिमाइंडर्स बस बजने ही वाले हैं ।

जागो कि दरवाज़े के पीछे हफ़्ते भर से
टंगे कपड़े धुलने के इंतज़ार में
तुम्हारा बासी चेहरा देख रहे है।
जागो कि इस हफ़्ते रिलीज़ हुई
मूवी भी तुम्हें सिनेमा हॉल में देखना चाहती है ।

ये वीकेंड तुम्हारे वीकडेज़ से
भी ज़्यादा व्यस्त है ।
और तुम कहते हो, छुट्टी का दिन है
आज सब कुछ मस्त है !

हफ़्ते भर तड़पकर कहते हो
काम से एक मिनट की फ़ुर्सत नहीं ।
तुम्हीं बताओ,
वीकेंड पर भी तुम्हारे पास
ख़ुद के लिए वक़्त नहीं !

Friday, June 27, 2014

स्टेशनरी शॉप...

नुक्कड़ की स्टेशनरी शॉप वाले अंकल,

सुना है आपकी दुकान अब बंद होने वाली है। आपकी दुकान से जुड़ी मेरी बहुत-सी यादें हैं, जिनके बारे में मैं अबतक सोचती हूँ । आप सोचेंगे आपकी दुकान से मेरी ऐसी कौन सी यादें जुड़ी है.. तो मैं कहूँगी, जुड़ी हैं, बहुत सारी यादें जुड़ी हैं । ज़रूरी नहीं होता कि किसी की याद हमें तभी आये, जब सामने वाला भी हमें याद करता हो । मैं जब कभी किसी भी स्टेशनरी शॉप के बगल से गुज़रती हूँ, मुझे अपनी वो तमाम बातें याद आती हैं.. जो मैंने आपकी दुकान के काउंटर पर खड़े हुए संजोयी थी । वहीँ, जहां मैंने कई बार अपनी इच्छाओं को इरेज़र से मिटाया था ।

मैं आपकी दुकान पर जाती और अपने सारे पसंदीदा सामानों के दाम पूछकर वापस आ जाती.. इस काम को मैं हर बार करती जब भी आपकी दुकान में कुछ नया टंगा नज़र आता । वो कई नोंक वाली पेंसिल आती थी ना.. जिसमें से एक की नोंक खतम हो जाए तो पीछे से दूसरा निकाल कर डाल दो, और बाहर से अंदर का सबकुछ दिखता था । वो पेंसिल मुझे बहुत पसंद थी । मेरी क्लास में एक लड़की के पास वैसी ही पेंसिल थी, सभी रंगों की.. वो हर रोज़ सबको दिखाती । पर मेरी पेंसिल बॉक्स से वैसी पेंसिल नदारद थी ।

मैंने आपकी दुकान पर उस पेंसिल के कई रंग पसंद कर रखे थे । पीला और गुलाबी मुझे सबसे ज़्यादा अच्छा लगता था । लेकिन गुज़रते हुए जब आपकी दुकान में देखती तो हर रोज़ मेरी पसंद की एक पेंसिल वहाँ से गायब हो जाती । शायद मुझसे ज़्यादा वो पेंसिल किसी और को पसंद थे.. उसकी पसंद पूरी हो जाती.. मेरी पसंद विंडो शॉपिंग बन जाती ।

एक और था, कई रंगों वाले पेंसिल का पैकेट । स्केच पेन से थोड़ा महंगा आता था.. वो भी पसंद था मुझे । कॉपी के सादे पन्नों पर कई चित्र बनाए थे, सोचा था वो पेंसिल जब मेरे पास आएगी तब उनमें रंग भरुंगी ।

पर वो सारे चित्र अब भी अधूरे है.. कुछ तो खराब हो गए.. कुछ फेंक दिए, आपकी स्टेशनरी की दुकान पर देखे ख्वाबों की तरह ।

पर अब जब भी किसी को ऐसी चीज़ पसंद करते हुए देखती हूँ, तुरंत खरीद कर देती हूँ । दीदी के बच्चों को कई बार लाकर दिया, ड्राइंग बुक के साथ वो रंग-बिरंगी पेंसिल । जब वो मुस्कुराकर उसे इस्तेमाल करते हैं, मेरे सपने हंसने लगते हैं । मैं ख़ुद को वहीं, आपकी काउंटर पर खड़ी पाती हूँ.. खिलखिलाकर हँसती हुई.. सारे सामान अपने हाथों में लिए ।

आपकी दुकान ने मेरे सपनों को भले ही पूरा न किया हो, लेकिन किसी और के सपनों को अधूरा ना रहने देने की ताक़त दी है । सच बताऊँ तो मुझे अब महंगे पेन अच्छे नहीं लगते.. ऐसा लगता है उनसे हैंडराइटिंग ही नहीं बन रही । आप अपनी दुकान बंद मत होने दीजिये.. क्या पता अब भी मेरी तरह कोई रोज़ आपकी दुकान के चक्कर लगाती हो। प्लीज़, उसके ख़्वाबों का शटर मत गिराइए ।  उसके सपने तो बंद नहीं होने चाहिए न !

आपकी ग्राहक,
जिसने आपकी दुकान से शायद ही कभी कुछ ख़रीदा हो ।

Saturday, June 21, 2014

ऐसी तैसी डेमोक्रेसी

पिछ्ले एक हफ़्ते से इस पर लिखना चाह रही थी, पर लिख आज रही हूँ । हैबिटैट में ऐसी तैसी डेमोक्रेसी नाम से एक स्टैंड-अप कॉमेडी शो हो रहा था । मुझे ये शो हर हाल में देखना था, इतनी शिद्दत से मैंने यह शो देखने की चाहत की थी कि मुझे इसकी टिकट इस शो के मिस्टर परफ़ॉर्मर की दया-दृष्टि से मिल गयी । जी, इस मामले में तो मेरी किस्मत बहुत अच्छी निकली ।


बहरहाल, यह एक स्टैंड अप कॉमेडी शो था । इसके पहले इस तरह का शो कभी देखा नहीं था, तो मेरे लिए बहुत ख़ास रहा । सच कहूं, तो "स्टैंड अप कॉमेडी" की सही परिभाषा मुझे भी नहीं पता थी । पर यह शो देखने के बाद कुछ-कुछ तो समझ आ गया । ख़ास बात यह रही कि शो में पहला मज़ाक/सटायर/तंज इसी बात पर था कि स्टैंड अप शो होता क्या है ! वरुण ग्रोवर और संजय राजौरा ने ऑडिटोरियम में खचाखच भरी भीड़ को हंसाने का ज़िम्मा लिया था और इसमें उनका बखूबी साथ निभाया म्यूजिशियन राहुल राम ने । बीच-बीच में डेमोक्रेसी पर तंज करते गाये कुछ गीत बेहद मनोरंजक रहे । लाइव कॉमेडी शो की यही अच्छी बात होती है कि परफॉरमेंस देने वाले सीधे तौर पर ऑडियंस से कनेक्ट करते हैं । यहाँ भी वही हुआ, लेकिन वरुण ग्रोवर को दिल्ली की ऑडियंस के ह्यूमर पर शायद थोड़ा शक़ था.. इसलिए जब उनके एक पंच पर हम सब हँसे, तो मिस्टर परफ़ॉर्मर ने बड़ी ही अदा के साथ कहा कि, "I never thought delhi audience will understand it."  इस बात पर उन्हें डबल तालियाँ मिली । नब्बे मिनट तक पूरा ऑडिटोरियम हँसता रहा । हाँ, शो के दौरान कुछ तीखी गालियों का ज़रूर इस्तेमाल हुआ, जिन्हें मैं अगली बार से कम करने को कहूँगी ।


हँसते-हँसाते नब्बे मिनट का शो खत्म हुआ पर मुझे लग रहा था कि यह नब्बे मिनट थोड़ी देर और चलता । शो खत्म होने के बाद पूरी ऑडिटोरियम ने स्टैंडिंग ओवेशन दिया (पूरे दिल से)। इस पूरे दिल से में दिल्लीवालों को एक परसेंट इस बात की भी ख़ुशी थी कि यह शो मुंबई के बदले पहले दिल्ली में हुआ । इस मामले में दिल्ली १-० से आगे हो चुका है ।



हालांकि, मुझे इस शो की टिकट बहुत आराम से मिल गयी थी फिर भी मैं इसके अगले शो के लिए सबको टिकट खरीद कर इसे देखने की गुज़ारिश करुँगी । यकीन मानिए, मुझे इस शो के प्रमोशन करने के पैसे नहीं मिले है, लेकिन हाँ, ये ज़रूर कहूँगी कि जहां आप 250-300 ₹ की Sub खा सकते हैं और उससे चर्बी चढ़ा सकते हैं तो उस चर्बी को उतारने के लिए और उस Sub से भी ज़्यादा हेल्दी 'हंसने' के लिए तो इतने पैसे खर्च किये ही जा सकते है । यह बात मुझे ज़्यादा अच्छे से समझ आई जब मैंने अपनी रो में ही बैठे एक उम्रदराज़ को पूरे शो के दौरान ज़ोर-ज़ोर से हँसते सुना था । और मैं, जिसे वापस आते वक़्त मेट्रो-ऑटो में हर बात हल्की लग रही थी । फ़िक्र नॉट टाइप । और ये सब कुछ स्टेज के उन 'माय डिअर' परफारमर्स की वजह से ।






 

Friday, June 20, 2014

यात्रा संस्मरण

यह यात्रा संस्मरण मेरा नहीं । इसमें मेरे भैया की पहली विदेश यात्रा के दौरान पर्थ शहर में घटी एक घटना का ज़िक्र है । शब्द उसी के हैं, बस ब्लॉग मेरा है । बहुत दिनों पहले उससे ज़ोर-ज़बरदस्ती से इस घटना को डायरी में लिखवा तो लिया था पर ब्लॉग पर आज टाइप करके डाला । पब्लिश करने जा रही थी तो ध्यान आया कि आज ही की तारीख़ पर भैया ने उड़ान भरी थी । अब यह यात्रा संस्मरण आप सब से शेयर कर रही हूँ... 



उस दिन मैं पर्थमिंट (Perthmint) से बैज़ंडीन (Bassendean) स्टेशन तक ट्रेन में सफ़र कर रहा था । स्टेशन पर टिकट ख़रीदने के लिए मैं  क्यू में लग तो गया, लेकिन जब मेरी बारी आई तो पता चला कि वह एक इन्क्व्यारी काउंटर है और ट्रेन की टिकेट ऑटोमैटिक टिकट वेंडिंग मशीन (एटीवीएम) से मिलेंगे ।
माफ़ कीजियेगा, मैं बताना भूल गया। ये ऑस्ट्रेलिया के एक शहर पर्थ की घटना है । मेरी पहली विदेश यात्रा के दौरान की । हाँ, मुझे पता नहीं था कि भारत की तरह विदेश में बड़े नोट लेकर घूमना आम बात नहीं है । मेरे पर्स में पचास-पचास डॉलर के नोट थे, वो भी कई सारे । क्यूंकि मुझे लगा था कि अगर ज़रुरत पड़ जायेगी तो कहाँ-कहाँ एटीएम ढूंढता फिरूंगा !


ख़ैर, किसी तरह खुदरे पैसे जोड़ जाड़कर मैंने एटीवीएम से टिकट ली और ट्रेन के सफ़र पर निकल पड़ा । एक के बाद एक ख़ूबसूरत इलाकों से होती हुई ट्रेन बैज़ंडीन स्टेशन पहुंची । बिलकुल वीरान, सुनसान, खाली पड़े स्टेशन पर कोई भी नहीं था .. सिवाय एक स्टेशन मास्टर और एक पुलिस वाले के । जिसने दिल्ली मेट्रो के रणभूमि टाइप वाले मेट्रो स्टेशन देखे हो, उसके लिए ये सब बहुत ही सुकून देने वाला था..अचंभित करने वाला तो था ही । वहाँ से निकल कर मैंने एक बस ली और कैवरशम वाइल्डलाइफ पार्क (Caversham Wildlife Park) के लिए चल दिया। वीकेंड पर यही जगह देखूंगा, ऐसा प्लान मैंने बनाया था । सो वहाँ पर मैंने बहुत सारे कंगारू के साथ कई और जानवर देखे ।


आराम से पूरा पार्क घूमने के बाद, (वापसी की टिकट खरीदने के लिए मुझे खुल्ले पैसों की ज़रुरत पड़ेगी.. ये बात मैं भूल चुका था।) मुझे बैज़ंडीन स्टेशन वापस आने के लिए टिकट खरीदनी थी, पर मेरे पास छोटी अमाउंट का कोई नोट या सिक्का नहीं था । कम से कम पचास डॉलर का नोट ही जेब में था । मुझे पचास डॉलर का चेंज चाहिए था, पर स्टेशन पर सिर्फ एक पुलिसवाला था । जब मैंने हिम्मत करके उससे पचास रुपये के चेंज  देने की बात कही, तो पुलिसवाले ने मुझे यूँ देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बुरा कह दिया हो । थोड़ी ऊँची आवाज़ में उसने मुझसे कहा, "Oh lord! 50 dollars! That's a big one. You can do a lot with that money but can't get a change. Go, get yourself a coffee from the market opposite the road. This way you can get coins."


इस बीच, मेरी बात ट्रेन स्टेशन से बाहर निकलते एक सज्जन ने सुनी और मेरे पास आकर मुझे एक डॉलर दे दिया और कहा, "Keep it. You can ask someone else for help for the rest of the amount." मैं अवाक् देखता रह गया.. वो सज्जन आगे निकल गए । पर फिर मैंने सोचा एक डॉलर काफ़ी नहीं है, इसलिए मैं स्टेशन से वापस बाहर निकल कर मार्केट पहुंचा । जिस कॉफ़ी शॉप की बात उस पुलिसवाले ने कही थी, वो दस मिनट पहले बंद हो चुका था । एक वृद्ध जोड़े से पूछा तो पता चला कि शाम पांच बजे सारी दुकानें बंद हो जाती है, पर आगे की तरफ़ एक-दो दुकानें खुली होंगी । मैं आगे बढ़ा, पर एक भी दुकान खुली न मिली । आगे एक ट्रैफिक सिग्नल पर सड़क पार करते वक़्त बैसाखी लिए एक आदमी (शायद भिखारी) से मैंने अपनी परेशानी ज़ाहिर की । मैं अभी ये जानने की कोशिश कर ही रहा था कि आगे कोई दुकान वगैरह है या नहीं.. इतने में ही उसने मुझे 70 सेंट (cent) दे दिये  और कहते हुए निकल गया कि आगे किसी और से मांग लेना। मैं सत्तर सेंट हाथ में लिए खड़ा रहा.. मैं समझ नहीं पाया भिखारी मैं था या वो ।


ख़ैर, ये जंग मुझे जारी रखनी थी.. सो मैं आगे बढ़ा । वहाँ मुझे दो महिलाएं मिली । जैसे ही मैंने अपनी बात कहनी शुरू की, उनमें से एक ने कहा, "No,No! I don't have any money. Go away."  अब इस बार मुझे यकीन हो गया था कि मैं परदेस में भिखारी घोषित हो चुका हूँ ।


अब तक मेरे पास 1 डॉलर 70 सेंट्स हो चुके थे । टिकट 4 डॉलर 50 सेंट्स की थी, इसलिए मुझे और पैसे चाहिए थे । आगे बढ़ा तो एक लांड्री में खूबसूरत गोरी लड़की दिखी। वो कपड़े धो रही थी । दूध का जला छाछ भी फूँक-फूंककर पीता है और किसी ख़ूबसूरत लड़की के सामने बेईज्ज़ती हो, ये किसे मंज़ूर होगा । इसलिए मैंने उससे मदद मांगने से पहले, मेरी जेब के सारे पैसे निकाले और कहा, "I have $600 and I am not a beggar. I need to get one of these bills changed so that I can buy a return ticket to Perthmint Station worth four dollar fifty cents and the automatic ticket vending machine is not accepting a $50 bill. Would you be able to help by changing this bill to smaller ones?"
इतनी धमाकेदार परफॉरमेंस के बावजूद उस लड़की ने चेंज नहीं दिया, पर मुझे एक डॉलर दे दिया । मेरे मना करने पर उसने कहा कि वो मेरी मदद कर रही है और बाकी की रकम मैं किसी और से मांग लूं ।
अब मेरे पास दो डॉलर सत्तर सेंट्स थे, टिकट खरीदने के लिए अब भी मेरे पास पूरे पैसे नहीं थे । मैं पूरी तरह से परेशान था और थक भी चुका था । आगे बढ़ा तो देखा अब वो सड़क खत्म हो चुकी थी और वो मार्केट भी । वहाँ से एक रेजिडेंशियल कॉलोनी  शुरू हो रही थी । थोड़ी दूर अंदर जाने पर एक छोटी दुकान दिखी, जिसमें soft drinks, cookies और biscuits जैसे आइटम बिक रहे थे । मैं खुश हो गया कि अब कुछ खरीदकर अपने पचास डॉलर के खुल्ले करा लूँगा । जब वी मेट की गीत की तरह मैं मन ही मन हाथ जोड़कर कहने लगा - प्लीज़ ! बाबाजी अब इस रात में और excitement मत देना। लेकिन कहानी अभी बाकी थी ।


दुकानदार फ्रेंच फ्राइज तल रहा था ।
"Hi, I'd like to have a coke." मेरे ऐसा कहने पर दुकानदार ने कहा, "Anything else, sir?"
मैंने आनन-फानन में एक स्मॉल फ्रेंच फ्राइज आर्डर कर दिया, क्यूंकि अब तक मुझे बहुत जोर की भूख लग चुकी थी । चार डॉलर के सामान के लिए दुकानदार ने मेरे पचास डॉलर के खुल्ले दे दिए। खुल्ले पैसे देखकर मुझे लग रहा था, मैंने कितनी बड़ी जंग जीत ली है ।
दुकान से निकलते वक़्त जब मेरी नज़र फ्रेंच फ्राइज के डब्बे पर पड़ी तो बड़ी हैरानी हुई । क्यूंकि वो इंडिया के मैकडी के फ्रेंच फ्राइज से दस गुने से भी ज़्यादा बड़ा था । ख़ैर, था तो यह मेरी मेहनत का ही फल । खाते हुए मैं स्टेशन पहुंचा और ATVM से वापसी की टिकट खरीद कर ट्रेन में चढ़ गया । इस बीच स्टेशन पर मौजूद उस पुलिसवाले ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा, "Man! Finally you got it." ट्रेन का दरवाज़ा बंद हो चुका था और मुझे ऐसा लगा जैसे भगवान उस पुलिसवाले के माध्यम से मुझे बहुत सारी बातें बताना चाह रहे हो ।
मैं इस घटना से काफ़ी कुछ सीख चुका था । अव्वल तो ये कि हमारे देश में ऐसी मदद देने वाले लोग कम मिलते हैं । और उस परदेस में मुझे भिखारी समझ कर या ना समझकर हर किसी ने बेहिचक मदद की । । यह संभव था कि टिकट के पूरे पैसे मांगकर जुटाये जा सकते थे । पर खुद ही आगे आकर मदद करने वाले लोगों का मैं शुक्रगुज़ार रहूँगा ।



ख़ैर, फ्रेंच फ्राइज खाते-खाते मैंने ट्रेन का सफ़र भी पूरा कर लिया.. होटल तक पहुँच गया.. कमरे तक पहुँच गया.. तब जाकर फ्रेंच फ्राइज ख़तम हुई । उस रात खाना भी नहीं खाया । कैसे खा सकता है कोई! इतने फ्रेंच फ्राइज और उसके ऊपर से इतनी चटपटे अनुभव के बाद ।