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Monday, March 2, 2015
Saturday, February 21, 2015
इश्क़ में शहर होना
हमें रवीश कुमार के कार्यक्रम में शिरकत करना बहुत पसंद आता है । लेकिन जब वो भीड़ से घिरे होते हैं तब हम भी दूर ही खड़े रहकर रवीश कुमार और उनके फैंस की आशिक़ी देखते रहते हैं । अक्सर ही सेमिनारों में किनारे या पीछे वाली सीट पर बैठकर उन्हें सुनना अच्छा लगता है.. (बीच में आप स्टॉकिंग भी कर लें तो किसी को कुछ ख़ास पता नहीं चलता) । ख़ैर, आज पुस्तक मेले के एंट्री गेट पर ही तीन-चार लड़कियों के हाथ में "इश्क़ में शहर होना" देखकर बेहद ख़ुशी हुई.. ऐसा लगा कि शहर भर में इश्क़ फैल चुका है । स्टॉल पर पहुंची तो किताब पर ऑटोग्राफ़ लेने वालों की लंबी लाइन । मैंने इस सुनहरे मौके का लाभ मेले के पहले-दूसरे दिन ही ले लिया था, इसलिए मैं एक बार फिर दूर ही खड़ी रही । रवीश कुमार कभी किताब पर साइन करते तो कभी ख़ुद ही माइक लेकर लोगों को बुलाने लगते । - " कौन स्टॉल नं है जी ये? अच्छा 2 3 7 . जी, नमस्कार मैं रवीश कुमार बोल रहा हूँ.. सबलोग हॉल नं 12 के स्टॉल नं 237 पर आ जाए.. अच्छा लगेगा आप सब से मिलकर ।" सहजता इतनी कि सेल्फी लेने वालों को डपट भी रहे हैं तो यह कहकर कि सेल्फ़ी एक राष्ट्रीय रोग है.. आओ दोस्त.. खिंचवा लो । मैंने सोचा आज मेरा मिलना शायद मुमकिन नहीं । इसलिए निकास गेट पर एक ओर खड़ी हो गयी । सर निकले तो उनकी एक जानने वाली को पांच मिनट चाहिए थे और मैंने कहा, "सर, मुझे भी दो मिनट।" "अच्छा, तो कुल मिलाकर 7 मिनट हो गए ।" पर सबके चहेते लप्रेककार सेल्फ़ी और फ़ोटो खिंचवाते खिंचवाते दुबारा स्टेज पर चले गए । हम भी हिले नहीं.. वहीं खड़े रहे । दुबारा बाहर आएं तो संपादक महोदय ने मुझे (बहुत प्यार से) सीधे मना कर दिया कि नहीं, तुम आज नहीं मिलोगी। लेकिन हमें तो मिलना ही था । बात कुछ ऐसी थी.. और भी बहुत कुछ थी। एक तोहफ़ा था, जो देना ज़रूरी था । बाकी तो ख़ास बातें हैं । पप्पाराज़ी कुछ ज़्यादा ही हो रही थी । रवीश कुमार को ही कहना पड़ा, "भई, हमें भी तो मेला घूमने दीजिये.. हमें भी किताबें खरीदनी है ।" जान बचाकर बचते बचाते निकले सर जी ।
प्रेम व्यक्तित्व से होता है । हमारा प्रेम इस शख़्स के व्यक्तित्व से है । हमने कभी इन्हें नज़दीक से जाना नहीं । पर दूर से समझने की कोशिश करते रहते हैं । इन्हें हम हर मंच पर बोलते देखना चाहते हैं.. न्यूज़रूम में सबको डपटते देखना चाहते हैं.. भीड़ को बुलाते भी.. भीड़ से बचते भी ।
(मेले की झलकियों पर बहुत कुछ लिखना है.. समय मिलते ही। वैसे कुछ बातें बेहद अपनी लगती हैं.. जिन्हें किसी के साथ बाँटने का मन नहीं करता। फिर भी ये निजी बात लिख दी है)
Wednesday, February 18, 2015
उस पार...
हवा के सुकून में बहना कभी
उस पार,
किले की दीवार का एक परदा होगा
ज़माने भर की बेताब निग़ाहों से छुपाता होगा
उस पार,
एक पूरा दिन अपना होगा
एक पूरे साल का बसंत होगा
चलना इन सीढ़ियों के पार कभी...
उस ओर सिर्फ़ राहतें होंगी
इस तरफ़ सारी शिकायतें होंगी
उस ओर सिर्फ़ मोहब्बतें होंगी
उस ओर सिर्फ़ हम दोनों की साँसें होंगी
चलना इन सीढ़ियों के पार कभी...
Wednesday, December 10, 2014
ख़त में लिपटी रात... (३)
चोर हो तुम । हाँ, कोई संबोधन नहीं देना है मुझे तुम्हें.. हर बार कोई ख़त ना लिखने का फ़ैसला करती हूँ, लेकिन हर बार कुछ लिखने का मन कर जाता है । तुम्हें भी हर बार मुझे नाराज़ करने की आदत पड़ी है । जानबूझकर नाराज़ करते हो ना मुझे? बस, नाराज़ करके छोड़ देते हो.. एक दफ़ा याद भी नहीं करते । तुम्हीं ने एक बार कहा था ना कि मुझे नाराज़ होने का बहाना चाहिए.. यही समझ लो, पर इस बहाने के बहाने प्यार से गले लगाने भी नहीं आओगे, ये कहाँ पता था ! प्यार करते भी हो मुझसे और नहीं भी । पास चाहते भी हो और नहीं भी । इसलिए कहती हूँ चोर हो तुम । प्यार करते हो तो फिर बताते क्यूँ नहीं ! ऐसा कौन सा तूफ़ान आ जाएगा इज़हार करने से ? चुप छुप के अपनी नज़्मों में मुझे लिखते हो और पूछने पर कहते हो कि मैं किसी के लिए कुछ नहीं लिखता । फिर अब अपनी हर नज़्म में मुझे क्यूँ सजाते हो ? तुमसे अब बात नहीं करती फिर भी याद नहीं करते मुझे । तुम्हारे कुछ बोलने से मुझे कितनी ख़ुशी होगी, ये बेहतर जानते हो तुम । फिर भी । मेरी लंबी बातों का अब भी दो शब्दों में जवाब देते हो तुम । ज़्यादा बोलने से ज़बान जलती है क्या तुम्हारी ! चोरों की तरह चुरा लिया । और चोरों की तरह प्यार करते हो । साथ रहते भी हो पर पास नहीं रहते । अब कहोगे, प्यार नहीं करता । अगर प्यार नहीं करते तो इतना याद क्यूँ आते हो ? मांगने पर भी कुछ नहीं दिया तुमने मुझे । पूछा तक नहीं । तुम मुझे कुछ दे ही नहीं सकते । सिवाय इस अजीब से एहसासात के । तुम मुझे कुछ नहीं दे सकते... प्यार भी नहीं ।
Tuesday, December 2, 2014
बहुत आरज़ू थी गली की तेरी...
कि पहले 'उन्वान'* लिखा है
फिर नज़्म को सजाना चाहा है
वो शायद इसलिए कि
तुम्हारे-मेरे साथ का आख़िरी
मकाम यही होना है
एहसास ये है
कि तुम्हें आगे बढ़ जाना है
और मुझे तुम्हें खो देना है
अब किसी और बात का
न इसरार^ होगा ना कोई तवक़्क़ो होगी
अब तुम्हारे दर पर ये मेरे कुछ
कोई अपना महसूस किया था
उस पागल ने तुम्हें
बेइंतहा अपनापन दिया था
तुम्हारे नाम को भी
अपने नाम के साथ सजाया था
आये थे बहार की तरह खिलते हुए
मुझ डाली को
अपनी बाहों में समेटने के लिए
उस शाम जब
तुमसे शर्माने का नज़ारा होता था
तभी मेरा
ख़ुद से ख़ुद ही में सिमटना होता था
वो तुम्हारे साथ
मेरी रूह का आख़िरी सुक़ून था ।
तुम्हें कितने पैग़ाम पहुँचाये फ़िर
सारे मौसमों को
तुम्हारे घर का पता भी बताया था
न जाने क्या क्या
उन ख़तों में लिखकर भेजा है मैंने तुम्हें
कोई हर्फ़ ना लिखकर भी
बहुत कुछ कहा है तुम्हें
मैं कहते कहते थक गयी
तुम चुप ही रहे
मैंने तुमसे चुप रहने की आदत जब सीख ली
तुम फिर भी ख़ामोश ही रहे ।
जो ख़्याल उड़ता है उनमें
अपनी शक्ल ढूंढती हूँ मैं
तुम्हें पास लाने का ख़्वाब
फिर सताने लगता है
तुम्हें भूलने का इरादा
ज़रा सा डगमगाने लगता है
पर तुम बेफ़िक्र रहना
मेरे ख़त तुम्हें अब परेशान नहीं करेंगे
आख़िरी तोहफ़ा
बग़ैर किसी ख़त के भेजा है तुम्हें ।
^ज़ोर देना या ज़िद करना
Friday, November 7, 2014
पुरानी दिल्ली का ख़ास अंदाज़
दिल्ली में ऑटो वाले और रिक्शे वाले अच्छे मिल जाए तो लगता है पिछले जन्म के अच्छे करम का कोई फल मिला है । पहले पुरानी दिल्ली की भूल भुलैया में गुम हुई, परेशान इतना हुई कि अमरुद खरीद के खाना भूल गयी और फिर भागमभाग से परेशान । मेट्रो स्टेशन के लिये रिक्शा लेना ही उचित समझा । रिक्शे वाले अंकल से हुई बातचीत ---
- कैसी सड़क है !!! पता नहीं भगवान ने कैसी सड़क बनायी है ।
- हाहा, भगवान ने बनायी है ये सड़क ?
- और नहीं तो क्या ! आदमी को पढ़ा लिखा होना चाहिए.. चाहे कोई भी काम करता हो, लेकिन पढ़ा होना चाहिए । जैसे मैं रिक्सा चलाता हूँ और भी कई सारे काम करता हूँ । जैसे ये विदेसी लोग आते हैं, कुछ बोलेंगे और हम इनका मुंह ही देखते रह जायेंगे । पहले तो इंगलिस मुझे आती नहीं थी । फिर धीरे धीरे सीखा । ये होती है ना, डिशनरी.. वो खरीद के लाया मैं ।
- तो अब आप विदेसी लोगों से बात कर लेते हो ?
- हाँ, और नहीं तो क्या? वो बोलते है, हे विल यू गो । यस यस कमऑन ।
(मैं अंकल की बात सुनने की कोशिश कर रही थी, समझ रही थी और हँस भी रही थी । सामने से बाइक पर बैठे दो लड़के आ रहे थे, बड़बड़ाते हुए आगे निकले, अरे ये तो हँस रही है । (भगवान्, इस देश में सबको सद्बुद्धि दे) ख़ैर..)
- पहले तो मुझे स्पाइस का मतलब भी नहीं पता था, एक लेडीस आई और बोली कि स्पाइस मार्केट ले चलो । मैं कहूं, ये क्या होता है ? फिर समझ आया ।
मेहनत करना चाहिए.. मेहनत करने से जो है सरीर का कंफिडेंस बना रहता है । अच्छा अच्छा खाओ..खूब खाओ और कुछ नहीं । मैं तो कुछ गलत नहीं खाता.. सिर्फ़ चाय और खाना । ओनली टी एंड फूड । अरे बहुत जाम है.. यही तो फेमस है.. दिल्ली का जाम और लखनऊ का आम ।
(दरयागंज का ट्रैफिक खचाखच था । मेरे लिए जाम जाए चूल्ही में । मैं अंकल की बातों पर कॉसन्ट्रेट कर रही थी ।)
- अच्छा ये जो बिहारी लोग होते है, ये कम पढ़े-लिखे होते है । इनका प्रतिसत बहुत कम होता है ।
- तो आप बिहार से हैं क्या ?
- नहीं, मैं यूपी का हूँ.. लखनऊ का ।
ये लो, आ गया । मिट्रो । खूब चैन से रहो और भगवान को फोन मिलाते रहो ।
- हेहे.. भगवान के पास फ़ोन है ?
- हाँ, और नहीं तो क्या! देखो, तुम्हें जो भी बात हो ना, भगवान को बोल दो । कहते हैं ना, उससे शेयर करो । ऐसा बोलते है, भगवान जो है, भक्त के बस में रहते है । फौन मिलाते रहो ।
Wednesday, November 5, 2014
बिखरी नज़्म...
तुम्हारा आना भी एक ख़्याल था
तुम्हारा जाना भी एक सपने जैसा है
तुम मुझसे मिले थे.. मेरे साथ रहे भी थे
अनजान होगे तुम इस बात से
पर ख़ुशबू तुम्हारी अब तलक मेरे
आसपास टिकी है
याद है तुम्हें...?
तुमने मुझे गले से भी लगाया था
ख़्वाबों के लचकते पुल पर चार कदम
साथ भी चले थे तुम
याद है तुम्हें...?
इक रोज़ तुमने मेरे गालों पर बोसे का गुलाल
लगाया था
बिखरी जुल्फों को कानों के पीछे फंसाकर
चेहरे को अपने दोनों हाथों से थामकर
चुपचाप मेरी नज़रों से कुछ कहा था
ये सब मेरा इक ख्व़ाब था क्यूंकि
तुम्हारा आना भी एक ख़्याल था
और जाना भी एक सपने जैसा है
अब बारिश..हवाएं..धूप.. ये सब आती हैं
तुम्हारा पैग़ाम लेकर
जैसे तेज़ हवा के चलने से मेरे झुमके
पायलों सा शोर करते हैं
हल्की धूप जब आँगन में खिलती है..
बिखरती है ।
ये सब हैं.. तुम कहीं नहीं
मैं वहीँ, उस समन्दर किनारे वाली बेंच पर
बैठे बैठे न जाने क्या बुदबुदा रही हूँ
तुम कहीं नहीं हो, लेकिन शायद सुन रहे हो
तुम्हारे पाँव के निशान भी दिखते नहीं...
...तुम गए नहीं हो क्या अभी तक...?
